नभतैं सुरपुष्प सु वृष्टि गिरै,
मनु मन्मथ श्रीपति पांय परै;
नभमें सुर – दुन्दुभि राजत है,
मधुरी मधुरी ध्वनि बाजत है. ३
सुर – नारि तहां शिर नावत है,
तुमरे गुण उज्ज्वल गावत है;
पद – पंकजको चल रूप कियौ,
बहु नाचत राजत भक्त हियौ. ४
घननं घननं घन घंट बजै,
सननं सननं सुर नारि सजै;
झननं झननं धुनि नूपुरकी,
छननं छननं छनमें फिरकी. ५
द्रग आनन ओप अनूप महा,
छन एक अनेकन रूप गहा;
बहु भाव दिखावत भक्ति भरे,
कविपै नहिं वर्णन जाय करे. ६
जिनकी धुनि घोर सुनें जबही,
भवि – मोर सुधी हरषैं तबही;
धर्मामृत वर्षत मेघझरी,
भाव – ताप – तृषा सब दूर करी. ७
सुर – इश सदा शिर नावत हैं,
गुण गावत पार न पावत हैं;
२३६ ][ श्री जिनेन्द्र