मुनि – इश तुम्हें नित ध्यावत हैं,
तबही शिव – सुंदरि पावत हैं. ८
प्रभु दीन – दयाल दया करिये,
हमरे विधि – बंध सबै हरिये;
जगमें मम वास रहै जबलौं,
उरमांही रहौ प्रभुजी तबलौं. ९
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श्री पद्मप्रभ जिन – स्तवन
(छंदः तोटक)
जय जय प्रभु पद्म जिनेशवरं,
अलि भव्यनको सुखपूर करं;
वर केवलज्ञान प्रकाश कियो,
भवि जीवनको भ्रम मेटि दियो. १.
भव — दाह — दवानल मेघझरी,
गज चार कषायन काज हरी;
दुःख — भूधर — भंजन वज्रकला,
भव – सागर – तारन पोत भला. २.
समवश्रत की छवि छाय रही,
तिहिंकी महिमा नहि जाय कही;
तिहिं मध्य विराजत गंधकुटी,
बहु रत्न अनोपम मांह जुटी. ३.
स्तवनमाळा ][ २३७