तिहिं मध्य सिंहासन सार दिपै,
तिहिं ज्योति विषैं शशि – सूर छिपै;
जिहिं उपर पद्म विराजत है,
सुर मौलनकी छबि लाजत है. ४.
तिहिं उपर आप त्रैलोक – धनी,
पद्मासन शोभ अनूप बनी;
त्रय छत्र फिरैं शिर चंद्र महा,
चतुषष्टि सु चामर विजय महा. ५.
इति आदि अनेक विभूतिवरं,
प्रगटी सब महिमा तीर्थकरं;
जिनके पद वंदित इन्द्र सदा,
गुण गावत हैं सुरवृंद सदा. ६.
हमहूं प्रभुजी गुण गावत हैं,
तुमरे पदको शिर नावत हैं;
विनति सुनिये जिनराज यही,
मम वास करो निज पास सही. ७.
जबलों जगमें मम वास रहै,
जबलों विधिनायक पास रहै;
जबलों शिवकी उर आश रहै;
तबलों तुम भक्ति प्रकाश रहै. ८.
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२३८ ][ श्री जिनेन्द्र