श्री सुपार्श्वनाथ जिन – स्तवन
(छंदः लक्ष्मीधरा)
जयति जिनराज गणराज नित ध्यावहीं,
जयति जिनराज सुरराज गुण गावहीं;
रटत ॠषिराज मुनिराज तुम नामको,
कटत सब कर्म भवि लहत शिव – धामको. १
गर्भसे पूर्व षट् मास मणि वर्षियो,
जन्मके होत तिहूं – लोक – जन हर्षियो;
अवधि बल जानि हरि आय सेवा करी,
मेरुगिरि शीश जिन – न्हवन – विधि विस्तरी. २
क्षीर – सागर तनों नीर निर्मल महा,
सहस अरु आठ भरि कलश हाथै लहा;
शक्र जिन – इशके शीश जल ढारियौ,
बजत दुन्दुभि महा शब्द जयकारियौ. ३
अघघ घघ घघघ घघ घघघ धुनि हो रही,
भभभ भभ भभभ भभ धधध धध शोरही;
शंख पटहादि बाजे बजें घोरही,
किन्नरी गीत गावैं महा शोरही. ४
न्हवन करि इन्द्र जिनराज गुण गावही,
जन्म – कल्याण कर देव दिव जावही;
बहुरि जिनराज कछु काल करि राजको,
त्यागि गृहवास व्रत धारि शिव साजको. ५
स्तवनमाळा ][ २३९