ध्यान कर खड्ग लै मोह अरि मारियो,
शेष रज विघ्न चउ घाति संहारियो;
समवसरणादि रचा बनी पावनी,
बाह्य आभ्यंतरे सर्व शोभा बनी. ६
इन्द्र धरनेन्द्र नागेन्द्र तहां आईयो,
पूजि जिनराजको शीश निज नाईयो;
धर्म – उपदेश दै भव्य जन तारियौ,
शैल संमेदतैं सिद्धपद धारियौ. ७
अधम उद्धारकी देव तुम हो सही,
जानि यह टेव तुम चरन सेवक गही;
अरज जिनराज यह आज सुनि लीजिये;
दासको वास प्रभु पास निज दीजिये. ८
श्री शीतलनाथ जिन – स्तवन
(चाल – मंगलकी)
शीतल पद जुग नमूं उभै कर जोरही,
भिदलापुर अवतरे अच्युत – पद छोरही;
दिढरथ तात विख्या सुनंदा मायजी,
चैत कृष्ण वसु गर्भ लिये सुखदायजी.
सुखदाय गर्भकल्याण काजे आय सुरपति सब मिले,
जननी सुसेवा राखि धनपति आप सुरलोकें चले;
षट – मास ले नव – मास दिनमें वार त्रय मणि वर्षये,
गर्भ – कल्याण महंत महिमा देखि सब जन हर्षये. १
२४० ][ श्री जिनेन्द्र