पूर्वाषाढ नछित्र माघ वदी द्वादसी,
जनमे श्री जिननाथ नभोगण सब हंसी;
चतुर निकाय मझारि घंटादि बजे भले,
नये मौलि फुनि पीठ सबै हरिके चले.
चले पीठ सु अवधितें जिन जन्म निश्चै हरि लखो,
डगि सप्त चलि नुति ठानि बासव मेरु चलनेकूं अखो;
जिन लेय पांडुक – वन विषैं अभिषेक करि पूजा करी,
पित मात दे जन्म कल्याणक ठानि थल चालो हरी. २
हेम वरण तन तुंग निवै धनुको सही,
लच्छिन श्रीवछ आयु पूर्व लखकी कही;
नीति – निपुण करि राज तजौ तृणवत तबै,
लौकांतिक सुर आय संबोधि सबै.
संबोधि आये माघ द्वादसि कृष्ण श्रीजिन वन गये,
नमः सिद्धेभ्यः कहि लौंच कीनों उपधि तजिकर मुनि भये;
सुर असुर नृपगण ठानि पूजा धवल मंगल गायही,
निःकर्म – कल्याणक सुमहिमा सुनत सब सुख पायही. ३
षष्टमि धरि निज ध्यान विषैं प्रभु थिर भये,
पूरन करि अनि काज सेयपुरमें गये;
क्षीरदान जुत भक्ति पुनर्वसुजी दिये,
हरिष देव आश्चर्य पंच तत – खिण किये.
किये आश्चर्य रत्न वर्षे अर्ध – द्वादश कोडि ही,
धरि ध्यान शुक्ल उपाय केवल घाति चारों तोडि ही;
स्तवनमाळा ][ २४१