Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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चर-अचर लोकअलोक जुगपति देखि सबही वर्निये,
सुनि इन्द्र ज्ञानकल्याण उत्सव पौष वदि चउदस किये.
योजन साढा सात लसै समवादिही,
लखि मुनिमें गणदेव इकासी आदिही;
पूरव सहस पचीस हीन वृष तीन ही,
विहरे केवल पाय आयु भई छीन ही.
भई छीन समेतगिरितैं आश्वनी सित अष्टमि सही,
असि ध्यान सुकल थकी अघाते हनै मुक्तितिया लही;
सब इन्द्र आय कियो महोत्सव मोक्षमंगल गायही,
हूं नमूं सीतलनाथके पद अमल गुणगण धाय ही.
वसु खित वसु क्रम हानि बसे वसु गुणमई,
ज्ञानावरणज घाति विश्व जान्यो सही;
देखो लोक अलोक हने द्रशनावली,
वेदनिको करि नाश अबाध भये बली.
फुनि बली सुद्ध चरित्रमें थिर मोह नाश थकी भये,
अवगाह गुण क्षय आयुतें निरकाय नाम गये थये,
गुण अगुरुलघु छय गोतके अंतराय छय बलऽनंतही,
सिध भये सीतलनाथजी तिरकाल बंदे संत ही.
वसु गुण ये विवहार, नियत अनंत ही,
जाणै गणधर पै न बखानत अंत ही;
ज्यों जलनिधि विस्तार कहें करतें इतौ,
बाल न मरम लहंत न जानत है कितौ.
२४२ ][ श्री जिनेन्द्र