Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 175-176.

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लोकानुप्रेक्षा ]

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भावार्थःबे इन्द्रियना देहथी संख्यातगणो त्रण इन्द्रियनो देह छे, त्रण इन्द्रियना देहथी संख्यातगणो चार इन्द्रियनो देह छे अने तेनाथी संख्यातगणो पंचेन्द्रियनो देह छे.

हवे जघन्य अवगाहनाना धारक बे इन्द्रियादि जीव कोण कोण छे ते कहे छेः

अणुद्धरीयं कुथो मच्छीकाणा य सालिसित्थो य
पज्जत्ताण तसाणं जहण्णदेहो विणिद्दिट्ठो ।।१७५।।
अनुद्धरीयकः कुन्थुः कायमक्षिका च शालिसिक्थः च
पर्याप्तानां त्रसानां जघन्यदेहः विनिर्द्दिष्टः ।।१७५।।

अर्थःबे इन्द्रिय तो अणुद्धरीजीव, त्रण इन्द्रियमां कुंथुजीव, चार इन्द्रियमां काण-मक्षिका अने पंचेन्द्रियमां शालीसिक्थ नामनो मच्छए त्रसपर्याप्त जीवोनो जघन्य देह कह्यो छे.

हवे जीवनुं लोकप्रमाणपणुं अने देहप्रमाणपणुं कहे छेः

लोयपमाणो जीवो देहपमाणो वि अच्छदे खेत्ते
उग्गाहणसत्तीदो संहरणविसप्पधम्मादो ।।१७६।।
लोकप्रमाणः जीवः देहप्रमाणः अपि आस्ते क्षेत्रे
अवगाहनशक्तितः संहरणविसर्पधर्मात् ।।१७६।।

अर्थःजीव लोकप्रमाण छे. वळी देहप्रमाण पण छे; कारण के तेमां संकोच-विस्तारधर्म होवाथी एवी अवगाहनशक्ति तेमां छे.

भावार्थःलोकाकाशना असंख्यातप्रदेश छे तेथी जीवना पण तेटला ज प्रदेश छे. केवलसमुद्घात करे ते वेळा ते लोकपूरण थाय छे. वळी संकोच-विस्तारशक्ति तेमां छे तेथी जेवो देह पामे तेटला ज प्रमाण ते रहे छे अने समुद्घात करे त्यारे तेना प्रदेश देहथी बहार पण नीकळे छे.