लोकानुप्रेक्षा ]
भावार्थः — बे इन्द्रियना देहथी संख्यातगणो त्रण इन्द्रियनो देह छे, त्रण इन्द्रियना देहथी संख्यातगणो चार इन्द्रियनो देह छे अने तेनाथी संख्यातगणो पंचेन्द्रियनो देह छे.
हवे जघन्य अवगाहनाना धारक बे इन्द्रियादि जीव कोण कोण छे ते कहे छेः —
अर्थः — बे इन्द्रिय तो अणुद्धरीजीव, त्रण इन्द्रियमां कुंथुजीव, चार इन्द्रियमां काण-मक्षिका अने पंचेन्द्रियमां शालीसिक्थ नामनो मच्छ — ए त्रसपर्याप्त जीवोनो जघन्य देह कह्यो छे.
हवे जीवनुं लोकप्रमाणपणुं अने देहप्रमाणपणुं कहे छेः —
अर्थः — जीव लोकप्रमाण छे. वळी देहप्रमाण पण छे; कारण के तेमां संकोच-विस्तारधर्म होवाथी एवी अवगाहनशक्ति तेमां छे.
भावार्थः — लोकाकाशना असंख्यातप्रदेश छे तेथी जीवना पण तेटला ज प्रदेश छे. केवलसमुद्घात करे ते वेळा ते लोकपूरण थाय छे. वळी संकोच-विस्तारशक्ति तेमां छे तेथी जेवो देह पामे तेटला ज प्रमाण ते रहे छे अने समुद्घात करे त्यारे तेना प्रदेश देहथी बहार पण नीकळे छे.