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हवे कोई अन्यमती जीवने सर्वथा सर्वगत ज कहे छे तेनो निषेध करे छेः —
अर्थः — जो जीव सर्वगत ज होय तो सर्व क्षेत्रसंबंधी सुख -दुःखनी प्राप्ति तेने ज होय पण एम जोवामां आवतुं नथी. पोताना शरीरमां ज सुख-दुःखनी प्राप्ति जोईए छीए, तेथी पोताना शरीरप्रमाण ज जीव छे.
अर्थः — जेम अग्नि स्वभावथी ज उष्ण छे तेम जीव छे ते ज्ञानस्वभाव छे; तेथी अर्थान्तरभूत एटले पोताथी जुदा प्रदेशरूप ज्ञानथी ज्ञानी नथी.
भावार्थः — नैयायिक आदि छे तेओ जीवनो अने ज्ञाननो प्रदेशभेद मानी कहे छे के ‘‘आत्माथी ज्ञान भिन्न छे अने ते समवाय तथा संसर्गथी एक थयुं छे तेथी तेने ज्ञानी कहीए छीए; जेम धनथी धनवान कहीए छीए तेम.’’ पण आम मानवुं ते असत्य छे. आत्मा अने ज्ञानने, अग्नि अने उष्णतामां जेवो अभेदभाव छे तेवो, तादात्म्यभाव छे.
हवे (गुण-गुणीने) भिन्न मानवामां दूषण दर्शावे छेः —