लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — जो जीवथी ज्ञान सर्वथा भिन्न ज मानीए तो ते बंनेमां गुणगुणीभाव दूरथी ज (अत्यंत) नाश पामे, अर्थात् आ जीवद्रव्य (गुणी) छे अने ज्ञान तेनो गुण छे एवो भाव ठरशे नहि.
हवे कोई पूछे के ‘गुण अने गुणीना भेद विना बे नाम केम कहेवाय?’ तेनुं समाधान करवामां आवे छेः —
अर्थः — जीव अने ज्ञानमां गुणगुणीभावथी कथंचित् भेद करवामां आवे छे. जो एम न होय तो ‘जे जाणे ते ज आत्मानुं ज्ञान छे’ एवो भेद केम होय?
भावार्थः — जो सर्वथा भेद होय तो ‘जाणे ते ज्ञान छे’ एवो अभेद केम कहेवाय? माटे कथंचित् गुणगुणीभावथी भेद कहेवामां आवे छे परंतु तेमां प्रदेशभेद नथी. ए प्रमाणे कोई अन्यमती गुण-गुणीमां सर्वथा भेद मानी जीव अने ज्ञानने सर्वथा अर्थान्तरभेद (पदार्थभिन्नतारूप भेद) माने छे तेना मतने निषेध्यो.
हवे, चार्वाकमती ज्ञानने पृथ्वी आदिनो विकार माने छे तेने निषेधे छेः —