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अर्थः — ज्ञानने पृथ्वी आदि पांच भूतोनो विकार माने छे ते चार्वाक भूतथी अर्थात् पिशाचथी ग्रहायो छे – घेलो छे; कारण के जीव विना ज्ञान क्यांय कोईने कोई ठेकाणे जोवामां आवे छे? क्यांय पण जोवामां आवतुं नथी.
हवे, एमां दूषण दर्शावे छेः —
अर्थः — आ जीव, सत्रूप अने चैतन्यरूप स्वसंवेदन प्रत्यक्षप्रमाणथी प्रसिद्ध छे तेने चार्वाक मानतो नथी, पण ते मूर्ख छे. जो जीवने जाणतो – मानतो नथी तो ते जीवनो अभाव केवी रीते करे छे?
भावार्थः — जे जीवने जाणतो ज नथी ते तेनो अभाव पण कही शके नहीं. अभावने कहेवावाळो पण जीव छे, केम के सद्भाव विना अभाव पण कह्यो जाय नहि.
हवे तेने ज युक्तिपूर्वक जीवनो सद्भाव दर्शावे छेः —
अर्थः — जो जीव न होय तो पोताने थतां सुख-दुःखने कोण जाणे? तथा इन्द्रियोना स्पर्शादिक विषयो छे ते बधाने विशेषताथी कोण जाणे?