Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 184-185.

< Previous Page   Next Page >


Page 103 of 297
PDF/HTML Page 127 of 321

 

लोकानुप्रेक्षा ]

[ १०३

भावार्थःचार्वाक (मात्र एक) प्रत्यक्षप्रमाणने माने छे. त्यां, पोताने थतां सुख-दुःखने तथा इन्द्रिओना विषयोने जाणे छे ते प्रत्यक्ष छे. हवे जीव विना प्रत्यक्षप्रमाण कोने होय? माटे जीवनो सद्भाव (अस्तित्व) अवश्य सिद्ध थाय छे.

हवे आत्मानो सद्भाव जेम सिद्ध थाय तेम कहे छेः

संकप्पमओ जीवो सुहदुक्खमयं हवेइ संकप्पो
तं चिय वेददि जीवो देहे मिलिदो वि सव्वत्थ ।।१८४।।
संकल्पमयः जीवः सुखदुःखमयः भवति संकल्पः
तदेव वेत्ति जीवः देहे मिलितः अपि सर्वत्र ।।१८४।।

अर्थःजीव छे ते संकल्पमय छे, अने संकल्प छे ते सुख -दुःखमय छे. ते सुख-दुःखमय संकल्पने जे जाणे छे ते ज जीव छे. जे देह साथे सर्वत्र मळी रह्यो छे तो पण, जाणवावाळो छे ते ज जीव छे.

हवे जीव, देह साथे मळ्यो थको, सर्व कार्योने करे छे ते कहे छेः

देहमिलिदो वि जीवो सव्वकम्माणि कुव्वदे जम्हा
तम्हा पयट्टमाणो एयत्तं बुज्झदे दोह्णं ।।१८५।।
देहमिलितः अपि जीवः सर्वकर्माणि करोति यस्मात्
तस्मात् प्रवर्तमानः एकत्वं बुध्यते द्वयोः ।।१८५।।

अर्थःकारण के जीव छे ते देहथी मळ्यो थको ज सर्व कर्म -नोकर्मरूप बधांय कार्योने करे छे; तेथी ते कार्योमां प्रवर्ततो थको जे लोक तेने देह अने जीवनुं एकपणुं भासे छे.

भावार्थःलोकोने देह अने जीव जुदा तो देखाता नथी पण बंने मळेला ज देखाय छेसंयोगथी कार्योनी प्रवृत्ति देखाय छे तेथी ते बंनेने एक ज माने छे.