Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 186-187.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा
हवे जीवने देहथी भिन्न जाणवानुं लक्षण दर्शावे छेः
देहमिलिदो वि पिच्छदि देहमिलिदो वि णिसुण्णदे सद्दं
देहमिलिदो वि भुंजदि देहमिलिदो वि गच्छेदि ।।१८६।।
देहमिलितः अपि पश्यति देहमिलितः अपि निशृणोति शब्दम्
देहमिलितः अपि भुंक्ते देहमिलितः अपि गच्छति ।।१८६।।

अर्थःजीव देहथी मळ्यो थको ज नेत्रोथी पदार्थोने देखे छे, देहथी मळ्यो थको ज कानोथी शब्दोने सांभळे छे, देहथी मळ्यो थको ज मुखथी खाय छे, जीभथी स्वाद ले छे तथा देहथी मळ्यो थको ज पगथी गमन करे छे.

भावार्थःदेहमां जीव न होय तो जडरूप एवा मात्र देहने ज देखवुं, स्वाद लेवो, सांभळवुं अने गमन करवुं इत्यादि क्रिया न होय; तेथी जाणवामां आवे छे के देहमां (देहथी) जुदो जीव छे अने ते ज आ क्रियाओ करे छे.

हवे ए प्रमाणे जीवने (देहथी) मळेलो ज मानवावाळा लोको तेना भेदने जाणता नथी एम कहे छेः

राओ हं भिच्चो हं सिठ्ठी हुं चेव दुब्बलो बलिओ
इदि एयत्ताविट्ठो दोह्णं भेयं ण बुज्झेदि ।।१८७।।
राजा अहं भृत्यः अहं श्रेष्ठी अहं चैव दुर्बलः बली
इति एकत्वाविष्टः द्वयोः भेदं न बुध्यति ।।१८७।।

अर्थःदेह अने जीवना एकपणानी मान्यता सहित लोक छे ते आ प्रमाणे माने छे केहुं राजा छुं, हुं नोकर छुं, हुं शेठ छुं, हुं दरिद्र छुं, हुं दुर्बळ छुं, हुं बळवान छुं. ए प्रमाणे मानता थका देह अने जीव बंनेना तफावतने जाणता नथी.

हवे जीवना कर्तापणादि संबंधी चार गाथाओ कहे छेः