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ज पापरूप थाय छे तथा उपशमभाव — मंद कषाय — युक्त थाय त्यारे ते पोते ज पुण्यरूप थाय छे.
भावार्थः — क्रोध-मान-माया-लोभना अति तीव्रपणाथी तो पापपरिणाम थाय छे तथा तेना मंदपणाथी पुण्यपरिणाम थाय छे; ते परिणामो सहित (जीवने) पुण्यजीव तथा पापजीव कहीए छीए. वळी एक ज जीव बंने परिणामयुक्त थतां पुण्यजीव – पापजीव पण कहीए छीए. सिद्धांतनी अपेक्षाए तो एम ज छे. कारण के सम्यक्त्व सहित जीवने तो तीव्र कषायनी जड (मिथ्याश्रद्धान) कपावाथी पुण्यजीव कहीए छीए तथा मिथ्याद्रष्टि जीवने भेदज्ञान विना कषायोनी जड कपाती नथी तेथी बहारथी कदाचित् उपशमपरिणाम देखाय तो पण तेने पापजीव ज कहीए छीए१ एम जाणवुं.
अर्थः — आ जीव, रत्नत्रयरूप दिव्य नाव वडे, संसारथी तरे छे – पार पामे छे माटे आ जीव ज रत्नत्रयथी युक्त थतो थको उत्तम तीर्थ छे. १. आ संबंधमां श्री गोम्मटसारमां पण कह्युं छे केः —
अहीं छ द्रव्य अधिकारमां कह्या छे वळी जे सम्यक्त्वगुण सहित होय तथा जे व्रतयुक्त होय तेने पुण्यजीव कहीए छीए, तेथी विपरीत एटले सम्यक्त्व अने व्रत