लोकानुप्रेक्षा ]
भावार्थः — जे तरे ते तीर्थ वा जेनाथी तरीए ते तीर्थ छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रयनाव (नौका) वडे आ जीव तरे छे तथा अन्यने तरवा माटे निमित्त थाय छे, तेथी आ जीव ज तीर्थ छे.
हवे अन्य प्रकारथी जीवना भेद कहे छेः —
अर्थः — बहिरात्मा, अंतरात्मा अने परमात्मा एवा त्रण प्रकारना जीवो छे; वळी परमात्मा पण अरहंत तथा सिद्ध एम बे प्रकारथी छे.
हवे तेमनुं स्वरूप कहे छे. त्यां बहिरात्मा केवा छे ते कहे छेः —
अर्थः — जे जीव मिथ्यात्वकर्मना उदयरूपे परिणम्यो होय, तीव्र कषाय (अनंतानुबंधी)थी सुष्ठु एटले अतिशय युक्त होय अने ए रहित जीव नियमथी पापजीव जाणवा. वळी मिथ्याद्रष्टि पापजीव छे ते अनंतानंत छे, सर्व संसारराशिमांथी अन्य गुणस्थानवाळानुं प्रमाण बाद करतां मिथ्याद्रष्टि जीवोनुं प्रमाण आवे छे. बीजुं सासादनगुणस्थानवाळा जीवो पण पापजीव छे कारण के तेओ अनंतानुबंधी चोकडीमांथी कोई एक प्रकृतिनो उदय थतां मिथ्यात्व सद्रश गुणने प्राप्त थाय छे, अने तेओ पल्यना असंख्यातभाग प्रमाण छे.