Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 192-193.

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लोकानुप्रेक्षा ]

[ १०७

भावार्थःजे तरे ते तीर्थ वा जेनाथी तरीए ते तीर्थ छे. सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रयनाव (नौका) वडे आ जीव तरे छे तथा अन्यने तरवा माटे निमित्त थाय छे, तेथी आ जीव ज तीर्थ छे.

हवे अन्य प्रकारथी जीवना भेद कहे छेः

जीवा हवंति तिविहा बहिरप्पा तह य अंतरप्पा य
परमप्पा वि य दुविहा अरहंता तह य सिद्धा य ।।१९२।।
जीवाः भवन्ति त्रिविधाः बहिरात्मा तथा च अन्तरात्मा च
परमात्मानः अपि च द्विविधाः अर्हतः तथा च सिद्धाः च ।।१९२।।

अर्थःबहिरात्मा, अंतरात्मा अने परमात्मा एवा त्रण प्रकारना जीवो छे; वळी परमात्मा पण अरहंत तथा सिद्ध एम बे प्रकारथी छे.

हवे तेमनुं स्वरूप कहे छे. त्यां बहिरात्मा केवा छे ते कहे छेः

मिच्छत्तपरिणदप्पा तिव्वकसाएण सुट्ठु आविट्ठो
जीवं देहं एक्कं मण्णंतो होदि बहिरप्पा ।।१९३।।
मिथ्यात्वपरिणतात्मा तीव्रकषायेण सुष्ठु आविष्टः
जीवं देहं एकं मन्यमानः भवति बहिरात्मा ।।१९३।।

अर्थःजे जीव मिथ्यात्वकर्मना उदयरूपे परिणम्यो होय, तीव्र कषाय (अनंतानुबंधी)थी सुष्ठु एटले अतिशय युक्त होय अने ए रहित जीव नियमथी पापजीव जाणवा. वळी मिथ्याद्रष्टि पापजीव छे ते अनंतानंत छे, सर्व संसारराशिमांथी अन्य गुणस्थानवाळानुं प्रमाण बाद करतां मिथ्याद्रष्टि जीवोनुं प्रमाण आवे छे. बीजुं सासादनगुणस्थानवाळा जीवो पण पापजीव छे कारण के तेओ अनंतानुबंधी चोकडीमांथी कोई एक प्रकृतिनो उदय थतां मिथ्यात्व सद्रश गुणने प्राप्त थाय छे, अने तेओ पल्यना असंख्यातभाग प्रमाण छे.

गोम्मटसार-जीवकांड