Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 194-195.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा

निमित्तथी जीवने तथा देहने एक मानतो होय ते जीवने बहिरात्मा कहीए छीए.

भावार्थःबाह्य परद्रव्यने जे आत्मा (स्वरूप) माने ते बहिरात्मा छे अने एम मानवुं मिथ्यात्वअनंतानुबंधीकषायना उदयथी थाय छे. माटे भेदविज्ञान रहित थतो थको देहादिथी मांडी समस्त परद्रव्यमां अहंकार-ममकार युक्त बनेलो (जीव) बहिरात्मा कहेवाय छे.

हवे अंतरात्मानुं स्वरूप त्रण गाथाथी कहे छेः

जे जिणवयणे कुसला भेदं जाणंति जीवदेहाणं
णिज्जियदुट्ठट्ठमया अंतरअप्पा य ते तिविहा ।।१९४।।
ये जिनवचने कुशलाः भेदं जानन्ति जीवदेहयोः
निर्जितदुष्ठाष्ठमदाः अन्तरात्मानः च ते त्रिविधाः ।।१९४।।

अर्थःजेओ जिनवचनमां प्रवीण छे, जीव अने देहमां भेद (भिन्नता) जाणे छे अने जेमणे आठ दुष्ट मद जीत्या छे ते अंतरात्मा छे; अने ते उत्कृष्ट, मध्यम तथा जघन्य भेदथी त्रण प्रकारना छे.

भावार्थःजे जीव जिनवाणीनो सारी रीते अभ्यास करी जीव अने देहना स्वरूपने भिन्न-भिन्न जाणे छे ते अंतरात्मा छे; तेने जाति, लाभ, कुळ, रूप, तप, बळ, विद्या अने ऐश्वर्य ए आठ मदनां कारणो छे तेमां अहंकारममकार ऊपजता नथी. कारण के, ए बधा परद्रव्यना संयोगजनित छे; तेथी तेमां गर्व करता नथी. ए अंतरात्मा त्रण प्रकारना छे.

हवे ए त्रणे प्रकारोमां उत्कृष्ट अंतरात्मानुं स्वरूप कहे छेः

पंचमहव्वयजुत्ता धम्मे सुक्के वि संठिदा णिच्चं
णिज्जियसयलपमाया उक्किट्ठा अंतरा होंति ।।१९५।।
पञ्चमहाव्रतयुक्ताः धर्मे शुक्ले अपि संस्थिताः नित्यम्
निर्जितसकलप्रमादाः उत्कृष्टाः अन्तराः भवन्ति ।।१९५।।