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निमित्तथी जीवने तथा देहने एक मानतो होय ते जीवने बहिरात्मा कहीए छीए.
भावार्थः — बाह्य परद्रव्यने जे आत्मा (स्वरूप) माने ते बहिरात्मा छे अने एम मानवुं मिथ्यात्व – अनंतानुबंधीकषायना उदयथी थाय छे. माटे भेदविज्ञान रहित थतो थको देहादिथी मांडी समस्त परद्रव्यमां अहंकार-ममकार युक्त बनेलो (जीव) बहिरात्मा कहेवाय छे.
हवे अंतरात्मानुं स्वरूप त्रण गाथाथी कहे छेः —
अर्थः — जेओ जिनवचनमां प्रवीण छे, जीव अने देहमां भेद (भिन्नता) जाणे छे अने जेमणे आठ दुष्ट मद जीत्या छे ते अंतरात्मा छे; अने ते उत्कृष्ट, मध्यम तथा जघन्य भेदथी त्रण प्रकारना छे.
भावार्थः — जे जीव जिनवाणीनो सारी रीते अभ्यास करी जीव अने देहना स्वरूपने भिन्न-भिन्न जाणे छे ते अंतरात्मा छे; तेने जाति, लाभ, कुळ, रूप, तप, बळ, विद्या अने ऐश्वर्य ए आठ मदनां कारणो छे तेमां अहंकार – ममकार ऊपजता नथी. कारण के, ए बधा परद्रव्यना संयोगजनित छे; तेथी तेमां गर्व करता नथी. ए अंतरात्मा त्रण प्रकारना छे.
हवे ए त्रणे प्रकारोमां उत्कृष्ट अंतरात्मानुं स्वरूप कहे छेः —