Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 196-197.

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लोकानुप्रेक्षा ]

[ १०९

अर्थःजे जीव पंचमहाव्रतथी युक्त होय, नित्य धर्मध्यान शुक्लध्यानमां रमतो होय अने जीत्या छे निद्रा आदि प्रमादो जेणे ते उत्कृष्ट अंतरात्मा छे.

हवे मध्यम अंतरात्मानुं स्वरूप कहे छेः

सावयगुणेहिं जुत्ता पमत्तविरदा य मज्झिमा होंति
जिणवयणे अणुरत्ता उवसमसीला महासत्ता ।।१९६।।
श्रावकगुणैः युक्ताः प्रमत्तविरताः च मध्यमाः भवन्ति
जिनवचने अनुरक्ताः उपशमशीलाः महासत्त्वाः ।।१९६।।

अर्थःजे जीव श्रावकना व्रतोथी संयुक्त होय वा प्रमत्तगुणस्थानथी युक्त जे मुनि होय ते मध्य अंतरात्मा छे. केवा छे तेओ? श्री जिनेन्द्रवचनमां अनुरक्तलीन छे, आज्ञा सिवाय प्रवर्तन करता नथी, मंदकषाय-उपशमभावरूप छे स्वभाव जेमनो, महा पराक्रमी छे, परिषहादि सहन करवामां द्रढ छे अने उपसर्ग आवतां प्रतिज्ञाथी जे चलित थता नथी.

हवे जघन्य अंतरात्मानुं स्वरूप कहे छेः

अविरयसम्माद्दिट्ठी होंति जहण्णा जिणिंदपयभत्ता
अप्पाणं णिंदंता गुणगहणे सुट्ठु अणुरत्ता ।।१९७।।
अविरतसम्यग्दृष्टयः भवन्ति जघन्याः जिनेन्द्रपदभक्ताः
आत्मानं निन्दन्तः गुणग्रहणे सुष्ठु अनुरक्ताः ।।१९७।।

अर्थःजे जीव अविरतसम्यग्द्रष्टि छे अर्थात् सम्यग्दर्शन तो जेमने छे पण चारित्रमोहना उदयथी व्रत धारण करी शकता नथी ते जघन्य अंतरात्मा छे. ते केवा छे? जिनेन्द्रनां चरणोना उपासक छे अर्थात् जिनेन्द्र, तेमनी वाणी तथा तेमने अनुसरनारा निर्ग्रंथगुरुनी भक्तिमां तत्पर छे, पोताना आत्माने सदाय निंदता रहे छे, चारित्रमोहना उदयथी व्रत धार्यां जतां नथी अने तेनी भावना निरंतर