Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 198-199.

< Previous Page   Next Page >


Page 110 of 297
PDF/HTML Page 134 of 321

 

११० ]

[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा

रहे छे, तेथी पोताना विभावभावोनी निंदा करता ज रहे छे, गुणोना ग्रहणमां सम्यक् प्रकारथी अनुरागी छे, जेमनामां सम्यग्दर्शनादि गुण देखे तेमना प्रत्ये अत्यंत अनुरागरूप प्रवर्ते छे, गुणो वडे पोतानुं अने परनुं हित जाण्युं छे तेथी गुणो प्रत्ये अनुराग ज थाय छे. ए प्रमाणे त्रण प्रकारना अंतरात्मा कह्या ते गुणस्थान अपेक्षाए जाणवा.

भावार्थःचोथा गुणस्थानवर्ती जघन्य अंतरात्मा छे, पांचमा अने छठ्ठा गुणस्थानवर्ती मध्य अंतरात्मा छे तथा सातमाथी मांडीने बारमा गुणस्थान सुधीना (साधको) उत्कृष्ट अंतरात्मा जाणवा.

हवे परमात्मानुं स्वरूप कहे छेः

ससरीरा अरहंता केवलणाणेण मुणियसयलत्था
णाणसरीरा सिद्धा सव्वुत्तमसुक्खसंपत्ता ।।१९८।।
सशरीराः अर्हन्तः केवलज्ञानेन ज्ञातसकलार्थाः
ज्ञानशरीराः सिद्धाः सर्वोत्तमसौख्यसंप्राप्ताः ।।१९८।।

अर्थःशरीरसहित अरहंत छे; ते केवा छे? केवलज्ञान द्वारा जेओ सकल पदार्थोने जाणे छे ते परमात्मा छे; तथा शरीररहित अर्थात् ज्ञान ज छे शरीर जेओने ते सिद्ध छे. केवा छे ते? ते शरीररहित परमात्मा सर्व उत्तम सुखोने प्राप्त थया छे.

भावार्थःतेरमा ने चौदमा गुणस्थानवर्ती अर्हंत शरीरसहित परमात्मा छे तथा सिद्धपरमेष्ठी शरीररहित परमात्मा छे.

हवे ‘परा’ शब्दनो अर्थ कहे छेः

णिस्सेसकम्मणासे अप्पसहावेण जा समुप्पत्ती
कम्मजभावखए वि य सा वि य पत्ती परा होदि ।।१९९।।
निःशेषकर्मनाशे आत्मस्वभावेन या समुत्पत्तिः
कर्म्मजभावक्षये अपि च सा अपि च प्राप्तिः परा भवति ।।१९९।।

अर्थःजे समस्त कर्मोनो नाश थतां पोताना स्वभावथी ऊपजे