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रहे छे, तेथी पोताना विभावभावोनी निंदा करता ज रहे छे, गुणोना ग्रहणमां सम्यक् प्रकारथी अनुरागी छे, जेमनामां सम्यग्दर्शनादि गुण देखे तेमना प्रत्ये अत्यंत अनुरागरूप प्रवर्ते छे, गुणो वडे पोतानुं अने परनुं हित जाण्युं छे तेथी गुणो प्रत्ये अनुराग ज थाय छे. ए प्रमाणे त्रण प्रकारना अंतरात्मा कह्या ते गुणस्थान अपेक्षाए जाणवा.
भावार्थः — चोथा गुणस्थानवर्ती जघन्य अंतरात्मा छे, पांचमा अने छठ्ठा गुणस्थानवर्ती मध्य अंतरात्मा छे तथा सातमाथी मांडीने बारमा गुणस्थान सुधीना (साधको) उत्कृष्ट अंतरात्मा जाणवा.
हवे परमात्मानुं स्वरूप कहे छेः —
अर्थः — शरीरसहित अरहंत छे; ते केवा छे? केवलज्ञान द्वारा जेओ सकल पदार्थोने जाणे छे ते परमात्मा छे; तथा शरीररहित अर्थात् ज्ञान ज छे शरीर जेओने ते सिद्ध छे. केवा छे ते? ते शरीररहित परमात्मा सर्व उत्तम सुखोने प्राप्त थया छे.
भावार्थः — तेरमा ने चौदमा गुणस्थानवर्ती अर्हंत शरीरसहित परमात्मा छे तथा सिद्धपरमेष्ठी शरीररहित परमात्मा छे.
हवे ‘परा’ शब्दनो अर्थ कहे छेः —
अर्थः — जे समस्त कर्मोनो नाश थतां पोताना स्वभावथी ऊपजे