लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — जीवद्रव्य उत्तम गुणोनुं धाम छे — ज्ञानादि उत्तम गुणो एमां ज छे, सर्व द्रव्योमां एक आ ज द्रव्य प्रधान छे. कारण के, सर्व द्रव्योने जीव ज प्रकाशे छे, सर्व तत्त्वोमां परमतत्त्व जीव ज छे अने अनंतज्ञान-सुखादिनो भोक्ता पण जीव ज छे — एम हे भव्य! तुं निश्चयथी जाण.
हवे जीवने ज उत्तम तत्त्वपणुं शाथी छे? ते कहे छेः —
अर्थः — जीव छे ते अंतस्तत्त्व छे तथा बाकीनां बधांय द्रव्यो बाह्यतत्त्व छे — ज्ञानादि रहित छे, अने ज्ञानरहित जे द्रव्य छे ते हित -अहित अर्थात् हेय-उपादेय वस्तुने केम जाणे?
भावार्थः — जीवतत्त्व विना बधुं शून्य छे माटे सर्वने जाणवावाळो तथा हित-अहितने एटले के हेय-उपादेयने समजवावाळो एक जीव ज परम तत्त्व छे.
हवे पुद्गलद्रव्यनुं स्वरूप कहे छेः —
अर्थः — सर्व लोकाकाश सूक्ष्म-बादर पुद्गलद्रव्योथी सर्व प्रदेशोमां भरेलुं छे. केवां छे ते पुद्गलद्रव्यो? नाना प्रकारनी शक्तिओ सहित छे.