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भावार्थः — शरीरादि अनेक प्रकारनी परिणमनशक्तिथी युक्त सूक्ष्म-बादर पुद्गलोथी सर्व लोकाकाश भरेलो छे.
अर्थः — रूप-रस-गंध-स्पर्शादि परिणामस्वरूपे, जे इन्द्रियो द्वारा ग्रहण करवा योग्य छे ते, सर्व पुद्गल द्रव्य छे अने ते संख्या अपेक्षाए जीवराशिथी अनंत गणां द्रव्य छे.
हवे पुद्गलद्रव्यने जीवनुं उपकारीपणुं कहे छेः —
अर्थः — पुद्गलद्रव्य जीवने घणा प्रकारनो उपकार करे छे; देह करे छे, इन्द्रियो करे छे, वचन करे छे तथा उच्छ्वास-निश्वास करे छे.
भावार्थः — संसारी जीवोना देहादिक, पुद्गलद्रव्योथी रचायेला छे अने ए वडे जीवनुं जीवितव्य छे ए उपकार छे.
अर्थः — उपर कह्या उपरांत पुद्गल द्रव्य जीवने अन्य पण उपकार करे छे. ज्यां सुधी आ जीवने संसार छे त्यां सुधी घणा