लोकानुप्रेक्षा ]
छे पण जे अर्थक्रियारूप नथी ते तो आकाशना फूलनी माफक शून्यरूप छे.
हवे सर्वथा नित्य-एकान्तमां अर्थक्रियाकारीपणानो अभाव दर्शावे छेः —
अर्थः — परिणाम रहित जे नित्य द्रव्य छे ते कदी विणसे-ऊपजे नहि, तो ते कार्य शी रीते करे? ए प्रमाणे जे कार्य न करे ते वस्तु ज नथी. जो ते ऊपजे – विणसे तो सर्वथा नित्यपणुं ठरतुं नथी.
हवे क्षणस्थायी (सर्वथा अनित्य – बौद्ध)ने कार्यनो अभाव दर्शावे छेः —
अर्थः — जो क्षणस्थायी – पर्यायमात्र तत्त्व क्षण-क्षणमां अन्य अन्य थाय एवुं विनश्वर मानीए तो ते अन्वयी द्रव्यथी रहित थतुं थकुं कांई पण कार्य साधतुं नथी. क्षणस्थायी-विनश्वरने वळी कार्य शानुं? (न ज होय).
हवे अनेकान्त वस्तुमां ज कार्यकारणभाव बने छे एम दर्शावे छेः —