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अर्थः — त्रणे काळमां एक एक समयमां पूर्व-उत्तर परिणामनो आश्रय करी जीवादिक वस्तुओमां नवा नवा कार्यविशेष थाय छे अर्थात् नवा नवा पर्याय ऊपजे छे.
हवे पूर्व-उत्तरभावमां कारण-कार्यभाव द्रढ करे छेः —
अर्थः — पूर्वपरिणामयुक्त द्रव्य छे ते तो कारणभावथी वर्ते छे तथा ते ज द्रव्य उत्तरपरिणामथी युक्त थाय त्यारे कार्य थाय छे एम तमे नियमथी जाणो.
भावार्थः — जेम पिंडरूपे परिणमेल माटी तो कारण छे अने तेनुं, घटरूपे परिणमेल माटी ते कार्य छे. तेम पूर्वपर्याय (प्रथमना पर्याय)नुं स्वरूप कही हवे जीव उत्तरपर्याययुक्त थयो त्यारे ते ज कार्यरूप थयो; एवो नियम छे. ए प्रमाणे वस्तुनुं स्वरूप कहीए छीए.
हवे जीवद्रव्यने पण ए ज प्रमाणे अनादिनिधन कार्य-कारणभाव साधे छेः —
अर्थः — जीवद्रव्य छे ते अनादिनिधन छे अने ते नवा नवा