लोकानुप्रेक्षा ]
पर्यायोरूपे प्रगट परिणमे छे; ते प्रथम द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावनी सामग्रीमां वर्ते छे पछी कार्यने – पर्यायने प्राप्त थाय छे.
भावार्थः — जेम कोई जीव पहेलां शुभपरिणामरूपे प्रवर्ते छे पछी स्वर्गने प्राप्त थाय छे, तथा (कोई जीव) पहेलां अशुभपरिणाम- रूपे प्रवर्ते छे पछी नरकादि पर्यायने प्राप्त थाय छे, एम समजवुं.
हवे ‘जीवद्रव्य पोतानां द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भावमां रहीने ज नवीन पर्यायरूप कार्यने करे छे’ एम कहे छेः —
अर्थः — जीवद्रव्य छे ते पोताना चेतनास्वरूपमां (भावमां) पोताना ज क्षेत्रमां, पोताना ज द्रव्यमां तथा पोताना परिणमनरूप समयमां रहीने ज पोताना पर्यायस्वरूप कार्यने साधे छे.
भावार्थः — परमार्थथी विचारीए तो पोतानां ज द्रव्य-क्षेत्र-काळ -भावस्वरूप थतो थको जीव, पर्यायस्वरूप कार्यरूपे परिणमे छे अने परद्रव्य-क्षेत्र-काळ-भाव छे ते तो निमित्तमात्र छे.
हवे अन्यरूप थईने कार्य करे तो तेमां दूषण दर्शावे छेः —
अर्थः — जो जीव पोताना स्वरूपमां रहीने पण परस्वरूपमां जाय तो परस्पर मळवाथी बधांय द्रव्यो एकरूप बनी जाय; ए महान