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-ध्रौव्यपणाना स्वभावरूप छे; अने तेने गुण-पर्याय परिणामस्वरूप सत्त्व सिद्धांतमां कह्युं छे.
भावार्थः — जीवादि वस्तु छे ते ऊपजवुं, विणसवुं अने स्थिर रहेवुं ए त्रणे भावमय छे, अने जे वस्तु गुण-पर्याय परिणामस्वरूप छे ते ज सत् छे. जेम जीवद्रव्यनो चेतना गुण छे, तेनुं स्वभाव- विभावरूप परिणमन छे तथा समये समये परिणमे छे ते पर्याय छे. ए ज प्रमाणे पुद्गलद्रव्यना स्पर्श, रस, गंध, वर्ण गुण छे; ते समये समये स्वभाव के विभावरूपे परिणमे छे ते पर्याय छे. ए प्रमाणे बधां द्रव्यो गुण-पर्याय परिणामस्वरूप प्रगट छे.
हवे द्रव्योना उत्पाद-व्यय ते शुं छे? ते कहे छेः —
अर्थः — वस्तुनो परिणाम समये समये प्रथमनो तो विणसे छे अने अन्य ऊपजे छे; त्यां पहेला परिणामरूप वस्तुनो तो नाश-व्यय छे तथा अन्य बीजो परिणाम उपज्यो तेने उत्पाद कहीए छीए. ए प्रमाणे उत्पाद-व्यय थाय छे.
हवे द्रव्यना ध्रुवपणानो निश्चय कहे छेः —
अर्थः — जीवद्रव्य, द्रव्यस्वरूपथी तो नथी नाशने प्राप्त थतुं के नथी ऊपजतुं; तेथी द्रव्यमात्रथी जीवने नित्यपणुं समजवुं.