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भावार्थः — जेम जीवद्रव्यनो चेतनगुण तेनी सर्व पर्यायोमां मोजुद छे – अनादिनिधन छे, ते सामान्यस्वरूपथी ऊपजतो – विणसतो नथी पण विशेषरूपथी पर्यायमां व्यक्तरूप (प्रगटरूप) थाय ज छे, एवो गुण छे. तेवी रीते बधांय द्रव्योमां पोत-पोताना साधारण (सामान्य) तथा असाधारण (विशेष) गुणो समजवा.
हवे कहे छे के द्रव्य, गुण अने पर्यायनुं एकपणुं छे ते ज परमार्थे वस्तु छेः —
अर्थः — सर्व द्रव्योमां जे गुण छे ते पण विशेषरूपथी ऊपजे – विणशे छे. ए प्रमाणे द्रव्य-गुण-पर्यायोनुं एकपणुं छे अने ते ज परमार्थभूत वस्तु छे.
भावार्थः — गुणनुं स्वरूप एवुं नथी के जे वस्तुथी सर्वथा भिन्न ज होय. गुण-गुणीने कथंचित् अभेदपणुं छे तेथी जे पर्याय ऊपजे – विणसे छे ते गुण – गुणीनो विकार छे (विशेष आकार छे). एटला माटे गुणने पण ऊपजता – विणसता कहीए छीए. एवुं ज नित्यानित्यात्मक वस्तुनुं स्वरूप छे. ए प्रमाणे द्रव्य-गुण-पर्यायोनी एकता ए ज परमार्थभूत वस्तु छे.
हवे आशंका थाय छे के — द्रव्योमां पर्याय विद्यमान ऊपजे छे के अविद्यमान ऊपजे छे? एवी आशंकानुं समाधान करे छेः –