लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — जो ‘द्रव्यमां पर्यायो छे ते पण विद्यमान छे अने तिरोहित एटले ढंकायेला छे’ एम मानीए तो उत्पत्ति कहेवी ज विफल (व्यर्थ) छे. जेम देवदत्त कपडाथी ढंकायेलो हतो तेने उघाड्यो एटले कहे के ‘आ ऊपज्यो’, पण एम ऊपजवुं कहेवुं ते वास्तविक नथी – व्यर्थ छे; तेम द्रव्यमां पर्याय ढांकी – ऊघडीने ऊपजती कहेवी ते परमार्थ नथी. माटे द्रव्यमां अविद्यमान पर्यायनी ज उत्पत्ति कहीए छीए.
अर्थः — अनादिनिधन द्रव्यमां काळादि लब्धिथी सर्व पर्यायोनी अविद्यमान ज उत्पत्ति छे.
भावार्थः — अनादिनिधन द्रव्यमां काळादि लब्धिथी अविद्यमान अर्थात् अणछती पर्याय ज ऊपजे छे. पण एम नथी के ‘बधी पर्यायो एक ज समयमां विद्यमान छे ते ढंकाती – ऊघडती जाय छे.’ परंतु समये समये क्रमपूर्वक नवीन नवीन ज पर्यायो ऊपजे छे. द्रव्य तो त्रिकाळवर्ती सर्व पर्यायोनो समुदाय छे अने काळभेदथी पर्यायो क्रमे थाय छे.
हवे द्रव्य अने पर्यायोने कथंचित् भेद-अभेदपणुं दर्शावे छेः —
अर्थः — द्रव्य अने पर्यायमां धर्म-धर्मीनी विवक्षाथी भेद करवामां आवे छे; परंतु वस्तुस्वरूपथी भेद थई शकतो नथी.
भावार्थः — द्रव्य अने पर्यायमां धर्म-धर्मीनी विवक्षाथी भेद