लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — ज्ञान छे ते ज्ञेयमां जतुं नथी तथा ज्ञेय पण ज्ञानना प्रदेशोमां आवतां नथी; पोतपोताना प्रदेशोमां रहे छे, तो पण ज्ञान तथा ज्ञेयमां ज्ञेय-ज्ञायक व्यवहार छे.
भावार्थः — जेम दर्पण पोताना ठेकाणे छे अने घटादिक वस्तु पोताना ठेकाणे छे, छतां दर्पणनी स्वच्छता एवी छे के जाणे घट दर्पणमां आवीने ज बेठो होय! ए ज प्रमाणे ज्ञान-ज्ञेयनो व्यवहार जाणवो.
हवे मनःपर्यय-अवधिज्ञान तथा मति-श्रुतज्ञाननुं सामर्थ्य कहे छेः —
अर्थः — मनःपर्ययज्ञान तथा अवधिज्ञान ए बंने तो देशप्रत्यक्ष छे; मतिज्ञान छे ते विशद एटले प्रत्यक्ष पण छे तथा परोक्ष पण छे, तथा श्रुतज्ञान छे ते परोक्ष ज छे.
भावार्थः — मनःपर्ययज्ञान – अवधिज्ञान छे ते एकदेशप्रत्यक्ष छे, कारण के जेटलो पोतानो विषय छे तेटलाने तो विशद – स्पष्ट जाणे छे; सर्वने जाणतुं नथी माटे तेने एकदेश कहीए छीए. मतिज्ञान छे ते इन्द्रिय-मनथी ऊपजे छे माटे व्यवहारथी इन्द्रियना संबंधथी तेने विशद पण कहीए छीए; ए प्रमाणे ते प्रत्यक्ष पण छे; परंतु परमार्थथी तो ते परोक्ष ज छे. तथा श्रुतज्ञान छे ते परोक्ष ज छे, कारण के ते विशद – स्पष्ट जाणतुं नथी.
हवे इन्द्रियज्ञान योग्य विषयने जाणे छे एम कहे छेः —