Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 259-260.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा
इन्द्रियजं मतिज्ञानं योग्यं जानाति पुद्गलं द्रव्यं
मानसज्ञानं च पुनः श्रुतविषयं अक्षविषयं च ।।२५८।।

अर्थःइन्द्रियोथी उत्पन्न जे मतिज्ञान छे ते पोताने योग्य विषय जे पुद्गलद्रव्य तेने जाणे छे. जे इन्द्रियनो जेवो विषय छे तेवो ज जाणे छे. मनसंबंधी ज्ञान छे ते श्रुतविषय (अर्थात् शास्त्र-वचनने सांभळे छे, तेना अर्थने जाणे छे) तथा इन्द्रियथी जाणवामां आवे तेने पण जाणे छे.

हवे इन्द्रियज्ञानना उपयोगनी प्रवृत्ति अनुक्रमथी छे एम कहे छेः

पंचेंदियणाणाणं मज्झे एगं च होदि उवजुत्तं
मणणाणे उवजुत्ते इंदियणाण ण जाएदि ।।२५९।।
पञ्चेन्द्रियज्ञानानां मध्ये एकं च भवति उपयुक्तम्
मनोज्ञाने उपयुक्ते इन्द्रियज्ञानं न जायते ।।२५९।।

अर्थःपांचे इन्द्रियोथी ज्ञान थाय छे पण तेमांथी कोई एक इन्द्रियद्वारथी ज्ञान उपयुक्त (जोडावुं) थाय छे, परंतु पांचे एकसाथ -एककाळमां उपयुक्त थतां नथी. वळी मनोज्ञानथी उपयुक्त थाय त्यारे इन्द्रियज्ञान ऊपजतुं नथी.

भावार्थःइन्द्रिय-मन संबंधी ज्ञाननी प्रवृत्ति युगपत् (एकसाथ) थती नथी पण एक काळमां एक ज ज्ञानथी उपयुक्त थाय छे. ज्यारे आ जीव घटने जाणतो होय त्यारे ते काळमां पटने जाणतो नथी. ए प्रमाणे ए ज्ञान क्रमरूप छे.

हवे, इन्द्रिय-मनसंबंधी ज्ञाननी क्रमथी प्रवृत्ति कही तो त्यां आशंका थाय छे केइन्द्रियोनुं ज्ञान एक काळमां छे के नहि? ए आशंकाने दूर करवा कहे छेः

एक्के काले एगं णाणं जीवस्स होदि उवजुत्तं
णाणाणाणाणि पुणो लद्धिसहावेण वुच्चंति ।।२६०।।