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अर्थः — इन्द्रियोथी उत्पन्न जे मतिज्ञान छे ते पोताने योग्य विषय जे पुद्गलद्रव्य तेने जाणे छे. जे इन्द्रियनो जेवो विषय छे तेवो ज जाणे छे. मनसंबंधी ज्ञान छे ते श्रुतविषय (अर्थात् शास्त्र-वचनने सांभळे छे, तेना अर्थने जाणे छे) तथा इन्द्रियथी जाणवामां आवे तेने पण जाणे छे.
हवे इन्द्रियज्ञानना उपयोगनी प्रवृत्ति अनुक्रमथी छे एम कहे छेः —
अर्थः — पांचे इन्द्रियोथी ज्ञान थाय छे पण तेमांथी कोई एक इन्द्रियद्वारथी ज्ञान उपयुक्त (जोडावुं) थाय छे, परंतु पांचे एकसाथ -एककाळमां उपयुक्त थतां नथी. वळी मनोज्ञानथी उपयुक्त थाय त्यारे इन्द्रियज्ञान ऊपजतुं नथी.
भावार्थः — इन्द्रिय-मन संबंधी ज्ञाननी प्रवृत्ति युगपत् (एकसाथ) थती नथी पण एक काळमां एक ज ज्ञानथी उपयुक्त थाय छे. ज्यारे आ जीव घटने जाणतो होय त्यारे ते काळमां पटने जाणतो नथी. ए प्रमाणे ए ज्ञान क्रमरूप छे.
हवे, इन्द्रिय-मनसंबंधी ज्ञाननी क्रमथी प्रवृत्ति कही तो त्यां आशंका थाय छे के – इन्द्रियोनुं ज्ञान एक काळमां छे के नहि? ए आशंकाने दूर करवा कहे छेः —