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नय वस्तुने साधतो नथी. एटला माटे अपेक्षाथी वस्तु अनेकान्त पण छे, एम जाणवुं ए ज सम्यक्ज्ञान छे.
हवे ‘श्रुतज्ञान परोक्षपणे सर्व वस्तुने प्रकाशे छे’ एम कहे छेः —
अर्थः — जे ज्ञान सर्व वस्तुने अनेकान्तस्वरूप परोक्षरूपे प्रकाशे – जाणे – कहे ते श्रुतज्ञान छे. ते श्रुतज्ञान संशय, विपरीतता अने अनध्यवसायथी रहित छे एम सिद्धान्तमां कह्युं छे.
भावार्थः — जे सर्व वस्तुने अनेकान्तरूप परोक्षरूपे प्रकाशे ते श्रुतज्ञान छे. शास्त्रनां वचन सांभळवाथी अर्थने जाणे ते परोक्ष ज जाणे छे; तथा शास्त्रमां बधीय वस्तुनुं स्वरूप अनेकान्तात्मक कह्युं छे एम सर्व वस्तुने जाणे वा गुरुजनोना उपदेशपूर्वक जाणे तो संशयादिक पण रहे नहि.
हवे श्रुतज्ञानना विकल्प (भेद) छे ते नय छे. तेमनुं स्वरूप कहे छेः —
अर्थः — वस्तुना एक धर्मनी विवक्षाथी जे लोकोना व्यवहारने साधे ते नय छे अने ते श्रुतज्ञाननो विकल्प (भेद) छे. वळी ते, लिंग (चिह्न)थी ऊपज्यो छे.