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अर्थः — वस्तुनो (कोई) एक धर्म, ते धर्मनो वाचक शब्द तथा ते धर्मने जाणवावाळुं ज्ञान ए त्रणेय नयना विशेष (भेद) छे.
भावार्थः — वस्तुनुं ग्रहण करवावाळुं ज्ञान, तेनो वाचक शब्द तथा वस्तु, एने (ए त्रणेने) जेम प्रमाणस्वरूप कहेवामां आवे छे तेम नय पण कहेवामां आवे छे.
हवे वस्तुना एक ज धर्मने ग्रहण करे एवा एक नय (ज्ञान)ने मिथ्यात्व शा माटे कहेवामां आवे छे? तेनो उत्तर कहे छेः —
अर्थः — प्रथम कहेला त्रण प्रकारना नय ते जो परस्पर अपेक्षासहित होय तो ते सुनय छे; परंतु ए ज ज्यारे अपेक्षा रहित सर्वथा एक एक ग्रहण करवामां आवे त्यारे ते दुर्नय (मिथ्यानय) छे. सुनयोथी सर्व व्यवहारनी (वस्तुना स्वरूपनी) सिद्धि थाय छे.
भावार्थः — नय छे ते बधाय सापेक्ष होय तो सुनय छे अने निरपेक्ष होय तो कुनय छे. सापेक्षताथी सर्व वस्तुव्यवहारनी सिद्धि छे – सम्यक्ज्ञान स्वरूप छे तथा कुनयोथी सर्व लोकव्यवहारनो लोप थाय छे – मिथ्याज्ञानरूप छे.
हवे, परोक्षज्ञानमां अनुमानप्रमाण पण छे, तेनुं द्रष्टांतपूर्वक स्वरूप कहे छेः —