लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — इन्द्रियोना व्यापार अने कायनी चेष्टाओथी शरीरमां जीवने जे जाणे छे तेने अनुमानप्रमाण कहे छे. ते अनुमानज्ञान पण नय छे अने ते अनेक प्रकारना छे.
भावार्थः — पहेलां श्रुतज्ञानना विकल्पोने नय कह्या हता, अहीं अनुमाननुं स्वरूप कह्युं के, शरीरमां रहेलो जीव प्रत्यक्ष ग्रहणमां आवतो नथी. तेथी स्पर्शन, स्वादन, वाणी, सूंघवुं, सांभळवुं, देखवुं वगेरे (इन्द्रियोना व्यापार) तथा गमन-आगमनादि कायानी चेष्टाओथी जाणवामां आवे छे के ‘शरीरमां जीव छे’. आ अनुमानज्ञान छे, कारण के साधनथी साध्यनुं ज्ञान थाय तेने अनुमान कहे छे अने ते पण नय ज छे. तेने परोक्षप्रमाणना भेदोमां कह्युं छे पण ते परमार्थथी नय ज छे. ते अनुमान स्वार्थ-परमार्थना भेदथी तथा हेतु-चिह्नना भेदथी अनेक प्रकारनुं कह्युं छे.
हवे नयोना भेदोने कहे छेः —
अर्थः — ते नय संग्रहपणाथी अर्थात् सामान्यपणे तो एक छे. द्रव्यार्थिक अने पर्यायार्थिक भेदथी बे प्रकारना छे. तथा विशेषताथी ए बंनेना भेदोथी नैगमनय आदिथी लईने छे ते नय छे, अने ते ज्ञान ज छे.
हवे द्रव्यार्थिकनयनुं स्वरूप कहे छेः —