१४४ ]
अर्थः — जे नय वस्तुने तेना विशेषरूपथी अविनाभूत सामान्यस्वरूपने नाना प्रकारनी युक्तिना बळथी साधे ते द्रव्यार्थिकनय छे.
भावार्थः — वस्तुनुं स्वरूप सामान्य-विशेषात्मक छे. विशेष विना सामान्य होतुं नथी. ए प्रमाणे युक्तिना बळथी सामान्यने साधे ते द्रव्यार्थिकनय छे.
हवे पर्यायार्थिकनयनुं स्वरूप कहे छेः —
अर्थः — जे नय अनेक प्रकारे सामान्यसहित सर्व विशेषने तेना साधननुं जे लिंग (चिह्न) तेना वशथी साधे ते पर्यायार्थिकनय छे.
भावार्थः — सामान्य सहित तेना विशेषोने हेतुपूर्वक साधे ते पर्यायार्थिकनय छे. जेम सत् सामान्यपणा सहित चेतन-अचेतनपणुं तेनुं विशेष छे, चित् सामान्यपणा सहित संसारी-सिद्ध जीवपणुं तेनुं विशेष छे, संसारीपणा सामान्य सहित त्रस-स्थावर जीवपणुं तेनुं विशेष छे, इत्यादि. वळी अचेतन सामान्यपणा सहित पुद्गलादि पांच द्रव्य तेनां विशेष छे तथा पुद्गल सामान्यपणा सहित अणु -स्कंध-घट-पट आदि तेनां विशेष छे. इत्यादि पर्यायार्थिकनय हेतुपूर्वक साधवामां आवे छे.
हवे द्रव्यार्थिकनयना भेदो कहे छे; त्यां पहेलां नैगमनय कहे छेः —