Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 270.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा
यः साधयति सामान्यं अविनाभूतं विशेषरूपैः
नानायुक्तिबलात् द्रव्यार्थः सः नयः भवति ।।२६९।।

अर्थःजे नय वस्तुने तेना विशेषरूपथी अविनाभूत सामान्यस्वरूपने नाना प्रकारनी युक्तिना बळथी साधे ते द्रव्यार्थिकनय छे.

भावार्थःवस्तुनुं स्वरूप सामान्य-विशेषात्मक छे. विशेष विना सामान्य होतुं नथी. ए प्रमाणे युक्तिना बळथी सामान्यने साधे ते द्रव्यार्थिकनय छे.

हवे पर्यायार्थिकनयनुं स्वरूप कहे छेः

जो साहेदि विसेसे बहुविहसामण्णसंजुदे सव्वे
साहणलिंगवसादो पज्जयविसओ णओ होदि ।।२७०।।
यः साधयति विशेषान् बहुविधसामान्यसंयुतान् सर्वान्
साधनलिङ्गवशात् पर्यायविषयः नयः भवति ।।२७०।।

अर्थःजे नय अनेक प्रकारे सामान्यसहित सर्व विशेषने तेना साधननुं जे लिंग (चिह्न) तेना वशथी साधे ते पर्यायार्थिकनय छे.

भावार्थःसामान्य सहित तेना विशेषोने हेतुपूर्वक साधे ते पर्यायार्थिकनय छे. जेम सत् सामान्यपणा सहित चेतन-अचेतनपणुं तेनुं विशेष छे, चित् सामान्यपणा सहित संसारी-सिद्ध जीवपणुं तेनुं विशेष छे, संसारीपणा सामान्य सहित त्रस-स्थावर जीवपणुं तेनुं विशेष छे, इत्यादि. वळी अचेतन सामान्यपणा सहित पुद्गलादि पांच द्रव्य तेनां विशेष छे तथा पुद्गल सामान्यपणा सहित अणु -स्कंध-घट-पट आदि तेनां विशेष छे. इत्यादि पर्यायार्थिकनय हेतुपूर्वक साधवामां आवे छे.

हवे द्रव्यार्थिकनयना भेदो कहे छे; त्यां पहेलां नैगमनय कहे छेः