लोकानुप्रेक्षा ]
अर्थः — जे नय भूत, भविष्य तथा वर्तमानरूप विकल्पथी संकल्पमात्र (पदार्थने) साधे ते नैगमनय छे.
भावार्थः — त्रण काळना पर्यायोमां अन्वयरूप छे ते द्रव्य छे. तेने पोताना विषयथी भूतकाळनी पर्यायने पण वर्तमानवत् संकल्पमां ले, भाविकाळनी पर्यायने पण वर्तमानवत् संकल्पमां ले तथा वर्तमानकाळनी पर्यायने ते किंचित् निष्पन्न१ होय वा अनिष्पन्न२ होय तो पण निष्पन्नरूप संकल्पमां ले एवा ज्ञान तथा वचनने नैगमनय कहे छे. तेना अनेक भेद छे. सर्व नयना विषयने मुख्यता-गौणताथी पोताना संकल्परूपे विषय करे छे. जेम के – मनुष्य नामना जीवद्रव्यने संसारपर्याय छे, सिद्धपर्याय छे तथा आ मनुष्यपर्याय छे एम कहे तो त्यां संसारपर्याय तो अतीत-अनागत-वर्तमान त्रण काळ संबंधी पण छे, सिद्धपणुं अनागत ज छे तथा मनुष्यपणुं वर्तमान ज छे, छतां आ नयना वचनथी अभिप्रायमां वर्तमान-विद्यमानवत् संकल्पथी परोक्षरूप अनुभवमां लईने कहे के ‘आ द्रव्यमां, मारा ज्ञानमां, हाल आ पर्याय भासे छे’ एवा संकल्पने नैगमनयनो विषय कहे छे. एमांथी कोईने मुख्य तथा कोईने गौणरूप कहे छे.
हवे संग्रहनय कहे छेः —
१ निष्पन्न = प्राप्त वा प्रगट. २ अनिष्पन्न = अप्राप्त वा अप्रगट.