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अर्थः — जे नय सर्व वस्तुने वा तेना देशने अर्थात् एक वस्तुना सर्व भेदोने अनेक प्रकार द्रव्य-पर्यायसहित अन्वयलिंग-विशिष्ट संग्रह करे – एकरूप कहे ते संग्रहनय छे.
भावार्थः — सर्व वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यलक्षण सत्थी — द्रव्य – पर्यायोथी अन्वयरूप ‘एक सत्मात्र छे’ एम कहे, वा सामान्य सत्स्वरूप द्रव्यमात्र छे वा विशेष सत्रूप पर्यायमात्र छे, वा जीववस्तु चित्सामान्यथी एक छे वा सिद्धत्वसामान्यथी सर्व सिद्धो एक छे, वा संसारीत्वसामान्यथी सर्व संसारीजीव एक छे, इत्यादि. तथा अजीवसामान्यथी पुद्गलादि पांचे द्रव्य एक अजीवद्रव्य छे वा पुद्गलत्वसामान्यथी अणु – स्कंध – घट – पटादि एक पुद्गलद्रव्य छे, इत्यादि संग्रहरूप कहे ते संग्रहनय छे.
आगळ व्यवहारनय कहे छेः —
अर्थः — संग्रहनय द्वारा वस्तुने विशेषरहित ग्रहण करी हती तेने परमाणु पर्यंत निरंतर जे नय भेदे ते व्यवहारनय छे.
भावार्थः — संग्रहनये सर्वने सत् कह्युं, त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के – द्रव्यसत् छे, पर्यायसत् छे. संग्रहनय द्रव्यसामान्यने ग्रहे छे त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के द्रव्य जीव-अजीव बे भेदरूप छे. संग्रहनय जीवसामान्यने ग्रहे छे त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के – जीव संसारी ने सिद्ध बे भेदरूप छे; इत्यादि. वळी संग्रहनय पर्यायसामान्यने संग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के पर्याय अर्थपर्याय तथा व्यंजनपर्यायरूप बे भेदथी छे. ए ज प्रमाणे संग्रहनय अजीवसामान्यने ग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय भेद करी अजीव एवां पुद्गलादि पांचे