Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 273.

< Previous Page   Next Page >


Page 146 of 297
PDF/HTML Page 170 of 321

 

१४६ ]

[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा

अर्थःजे नय सर्व वस्तुने वा तेना देशने अर्थात् एक वस्तुना सर्व भेदोने अनेक प्रकार द्रव्य-पर्यायसहित अन्वयलिंग-विशिष्ट संग्रह करेएकरूप कहे ते संग्रहनय छे.

भावार्थःसर्व वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यलक्षण सत्थीद्रव्य पर्यायोथी अन्वयरूप ‘एक सत्मात्र छे’ एम कहे, वा सामान्य सत्स्वरूप द्रव्यमात्र छे वा विशेष सत्रूप पर्यायमात्र छे, वा जीववस्तु चित्सामान्यथी एक छे वा सिद्धत्वसामान्यथी सर्व सिद्धो एक छे, वा संसारीत्वसामान्यथी सर्व संसारीजीव एक छे, इत्यादि. तथा अजीवसामान्यथी पुद्गलादि पांचे द्रव्य एक अजीवद्रव्य छे वा पुद्गलत्वसामान्यथी अणुस्कंधघटपटादि एक पुद्गलद्रव्य छे, इत्यादि संग्रहरूप कहे ते संग्रहनय छे.

आगळ व्यवहारनय कहे छेः

जो संगहेण गहिदं विसेसरहिदं पि भेददे सददं
परमाणूपज्जंतं ववहारणओ हवे सो हु ।।२७३।।
यत् संग्रहेण गृहीतं विशेषरहितं अपि भेदयति सततम्
परमाणुपर्यन्तं व्यवहारनयः भवेत् सः खलु ।।२७३।।

अर्थःसंग्रहनय द्वारा वस्तुने विशेषरहित ग्रहण करी हती तेने परमाणु पर्यंत निरंतर जे नय भेदे ते व्यवहारनय छे.

भावार्थःसंग्रहनये सर्वने सत् कह्युं, त्यां व्यवहारनय भेद करे छे केद्रव्यसत् छे, पर्यायसत् छे. संग्रहनय द्रव्यसामान्यने ग्रहे छे त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के द्रव्य जीव-अजीव बे भेदरूप छे. संग्रहनय जीवसामान्यने ग्रहे छे त्यां व्यवहारनय भेद करे छे केजीव संसारी ने सिद्ध बे भेदरूप छे; इत्यादि. वळी संग्रहनय पर्यायसामान्यने संग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय भेद करे छे के पर्याय अर्थपर्याय तथा व्यंजनपर्यायरूप बे भेदथी छे. ए ज प्रमाणे संग्रहनय अजीवसामान्यने ग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय भेद करी अजीव एवां पुद्गलादि पांचे