Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 274-275.

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लोकानुप्रेक्षा ]

[ १४७

द्रव्यो भेदरूप छे. संग्रहनय पुद्गलसामान्यने ग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय अणु-स्कंध-घट-पटादि भेदरूप कहे छे. ए प्रमाणे जेने संग्रहनय ग्रहण करे तेमां व्यवहारनय भेद करतो जाय छे अने ते त्यां सुधी के फरी बीजो भेद थई शके नहि, त्यां सुधी संग्रहव्यवहारनयनो विषय छे. ए प्रमाणे द्रव्यार्थिकनयना त्रण भेद कह्या.

हवे पर्यायार्थिकनयना भेद कहे छे. त्यां प्रथम ॠजुसूत्रनय कहे छेः

जो वट्टमाणकाले अत्थपज्जायपरिणदं अत्थं
संतं साहदि सव्वं तं पि णयं रिजुणयं जाण ।।२७४।।
यः वर्त्तमानकाले अर्थपर्यायपरिणतं अर्थम्
सन्तं साधयति सर्वं तमपि नयः ऋजुनयं जानीहि ।।२७४।।

अर्थःवर्तमानकाळमां अर्थपर्यायरूप परिणमेला अर्थने सर्वने सत्रूप साधे (ग्रहण करे) ते ॠजुसूत्रनय छे.

भावार्थःवस्तु समये समये परिणमे छे. वर्तमान एक समयनी पर्यायने अर्थपर्याय कहे छे अने ते ॠजुसूत्रनयनो विषय छे; ते वस्तुने पर्यायमात्र ज कहे छे. वळी घडी, मुहूर्त आदि काळने पण व्यवहारमां वर्तमान कहीए छीए. ते वर्तमानकाळस्थायी पर्यायने पण ॠजुसूत्रनय साधे छे तेथी तेनी स्थूल ॠजुसूत्र संज्ञा छे. ए प्रमाणे प्रथम कहेला द्रव्यार्थिक त्रण नय अने एक आ ॠजुसूत्रनय मळी चारे नयोने अर्थनय कहेवामां आवे छे.

हवे त्रण प्रकारना शब्दनयो कहे छे. त्यां पहेलां शब्दनय कहे छेः

सव्वेसिं वत्थूणं संखालिंगादि-बहुपयारेहिं
जो साहदि णाणत्तं सद्दणयं तं वियाणेह ।।२७५।।
सर्वेषां वस्तूनां संख्यालिङ्गादिबहुप्रकारैः
यः साधयति नानात्वं शब्दनयं तं विजानीहि ।।२७५।।