लोकानुप्रेक्षा ]
द्रव्यो भेदरूप छे. संग्रहनय पुद्गलसामान्यने ग्रहण करे छे, त्यां व्यवहारनय अणु-स्कंध-घट-पटादि भेदरूप कहे छे. ए प्रमाणे जेने संग्रहनय ग्रहण करे तेमां व्यवहारनय भेद करतो जाय छे अने ते त्यां सुधी के फरी बीजो भेद थई शके नहि, त्यां सुधी संग्रह – व्यवहारनयनो विषय छे. ए प्रमाणे द्रव्यार्थिकनयना त्रण भेद कह्या.
हवे पर्यायार्थिकनयना भेद कहे छे. त्यां प्रथम ॠजुसूत्रनय कहे छेः —
अर्थः — वर्तमानकाळमां अर्थपर्यायरूप परिणमेला अर्थने सर्वने सत्रूप साधे (ग्रहण करे) ते ॠजुसूत्रनय छे.
भावार्थः — वस्तु समये समये परिणमे छे. वर्तमान एक समयनी पर्यायने अर्थपर्याय कहे छे अने ते ॠजुसूत्रनयनो विषय छे; ते वस्तुने पर्यायमात्र ज कहे छे. वळी घडी, मुहूर्त आदि काळने पण व्यवहारमां वर्तमान कहीए छीए. ते वर्तमानकाळस्थायी पर्यायने पण ॠजुसूत्रनय साधे छे तेथी तेनी स्थूल ॠजुसूत्र संज्ञा छे. ए प्रमाणे प्रथम कहेला द्रव्यार्थिक त्रण नय अने एक आ ॠजुसूत्रनय मळी चारे नयोने अर्थनय कहेवामां आवे छे.
हवे त्रण प्रकारना शब्दनयो कहे छे. त्यां पहेलां शब्दनय कहे छेः —