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अर्थः — जे पुरुष उपशम करी एक स्वभावरूप थयो थको आ प्रमाणे लोकस्वरूपने ध्यावे छे – चिंतवन करे छे ते पुरुष क्षपित – नाश कर्यो छे. कर्मपुंज जेणे एवो, ए लोकनो ज शिखामणि (चूडामणि) थाय छे.
भावार्थः — ए प्रमाणे (जे पुरुष) साम्यभाव करी लोकानुप्रेक्षानुं चिंतवन करे छे ते पुरुष कर्मनो नाश करी लोकना शिखरे जई विराजमान थाय छे. अने त्यां अनंत, अनुपम, बाधारहित, स्वाधीन, ज्ञानानंदस्वरूप सुखने अनुभवे छे. अहीं लोकभावनानुं कथन विस्तारपूर्वक करवानो आशय एवो छे के अन्यमती लोकनुं स्वरूप, जीवनुं स्वरूप तथा हिताहितनुं स्वरूप अनेक प्रकारथी अन्यथा, असत्यार्थ अने प्रमाणविरुद्ध कहे छे. तेने सांभळी कोई जीव तो विपरीत श्रद्धान करे छे, कोई संशयरूप थाय छे तथा कोई अनध्यवसायरूप थाय छे. अने एवा विपरीतादि श्रद्धानथी चित्त स्थिरता पामतुं नथी, चित्त स्थिर थया विना यथार्थ ध्याननी सिद्धि थती नथी अने ध्यान विना कर्मोनो नाश थतो नथी. तेथी ए विपरीतादि श्रद्धान दूर थवा माटे लोकनुं अने जीवादि पदार्थोनुं यथार्थ स्वरूप जाणवा अर्थे अहीं विस्तारपूर्वक कथन कर्युं छे. तेने जाणी जीवादिनुं स्वरूप ओळखी पोताना स्वरूपमां चित्तने निश्चल स्थिर करी, कर्मकलंक नाश करी, भव्यजीव मोक्षने प्राप्त थाओ! एवो श्रीगुरुओनो उपदेश छे.
रागविरोध विडारीने, आतमरूप संभाळ.
आतमरूप संभाळ, मोक्षपुर वसो सदाही;
आधिव्याधिजरमरण, आदि दुःख ह्वै न कदा ही.
श्रीगुरु शिक्षा धारी, टाळी अभिमान कुशोक;
मनस्थिर कारण आ विचार, ‘निजरूप सुलोक’.