बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा ]
अर्थः — आ जीव, संसारमां अनादिकाळथी मांडी अनंतकाळ तो निगोदमां रहे छे अने त्यांथी नीकळी पृथ्वीकायादि पर्यायने धारण करे छे. अनादिथी अनंतकाळ सुधी नित्यनिगोदमां जीवनो वास छे. त्यां एक शरीरमां अनंतानंत जीवोना आहार, श्वासोश्वास, जीवन-मरण समान छे. एक श्वासना अढारमा भाग जेटलुं आयुष्य छे. त्यांथी नीकळी कदाचित् पृथ्वी-अप-तेज-वायुकायपर्याय पामे छे. ए पर्यायो पामवी दुर्लभ छे.
हवे कहे छे के – त्यांथी नीकळी त्रसपर्याय पामवी दुर्लभ छेः —
अर्थः — त्यां पृथ्वीकाय आदि सूक्ष्म तथा बादरकायोमां असंख्यात काळ भ्रमण करे छे. त्यांथी नीकळी त्रसपणुं पामवुं घणा कष्टे पण दुर्लभ छे; जेम चिंतामणि पामवो दुर्लभ छे तेम.
१ ‘आउ परिहीणो’ एवो पण पाठ छे तेनो एवो अर्थ छे के आयुथी परिहीन श्वासना अढारमा भागे जेनुं आयु छे.