Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 286-287.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा

भावार्थःपृथ्वी आदि स्थावरकायथी नीकळी चिंतामणिरत्ननी माफक त्रसपर्याय पामवी दुर्लभ छे.

हवे कहे छे केत्रसपणुं पण पामे तो त्यां पंचेन्द्रियपणुं पामवुं दुर्लभ छेः

वियलिंदिएसु जायदि तत्थ वि अच्छेदि पुव्वकोडीओ
तत्तो णीसरिदूणं कहमवि पंचिंदिओ होदि ।।२८६।।
विकलेन्द्रियेषु जायते तत्र अपि आस्ते पूर्वकोटयः
ततः निःसृत्य कथमपि पञ्चेन्द्रियः भवति ।।२८६।।

अर्थःस्थावरमांथी नीकळी त्रस थाय त्यां पण बे इन्द्रिय, त्रण इन्द्रिय, चार इन्द्रियरूप विकलत्रयपणाने पामे. त्यां (उत्कृष्ट) करोडो पूर्व रहे छे. त्यांथी नीकळी महाकष्टेथी पंचेन्द्रियपणुं पामे छे.

भावार्थःविकलत्रयमांथी नीकळी पंचेन्द्रियपणुं पामवुं दुर्लभ छे. जो विकलत्रयमांथी फरी स्थावरकायमां जई उत्पन्न थाय तो त्यां फरी घणो काळ भोगवे; एटला माटे पंचेन्द्रियपणुं पामवुं अतिशय दुर्लभ छे.

सो वि मणेण विहीणो ण य अप्पाणं परं पि जाणेदि
अह मणसहिदो होदि हु तह वि तिरिक्खो हवे रुद्दो ।।२८७।।
सः अपि मनसा विहीनः न च आत्मानं परं अपि जानाति
अथ मनःसहितः भवति स्फु टं तथा अपि तिर्यक् भवेत् रुद्रः ।।२८७।।

अर्थःविकलत्रयमांथी नीकळी पंचेन्द्रिय कदी थाय तो असंज्ञी मनरहित थाय छे. त्यां स्व तथा परनो भेद जाणतो नथी. कदाचित् मनसहित संज्ञी पण थाय तो रुद्र तिर्यंच थाय छे अर्थात् बिल्ली, घुवड, सर्प, सिंह अने मच्छादि क्रूर तिर्यंच थाय छे.

भावार्थःकदाचित् पंचेन्द्रिय थाय तो असंज्ञी थाय छे पण