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भावार्थः — पृथ्वी आदि स्थावरकायथी नीकळी चिंतामणिरत्ननी माफक त्रसपर्याय पामवी दुर्लभ छे.
हवे कहे छे के – त्रसपणुं पण पामे तो त्यां पंचेन्द्रियपणुं पामवुं दुर्लभ छेः —
अर्थः — स्थावरमांथी नीकळी त्रस थाय त्यां पण बे इन्द्रिय, त्रण इन्द्रिय, चार इन्द्रियरूप विकलत्रयपणाने पामे. त्यां (उत्कृष्ट) करोडो पूर्व रहे छे. त्यांथी नीकळी महाकष्टेथी पंचेन्द्रियपणुं पामे छे.
भावार्थः — विकलत्रयमांथी नीकळी पंचेन्द्रियपणुं पामवुं दुर्लभ छे. जो विकलत्रयमांथी फरी स्थावरकायमां जई उत्पन्न थाय तो त्यां फरी घणो काळ भोगवे; एटला माटे पंचेन्द्रियपणुं पामवुं अतिशय दुर्लभ छे.
अर्थः — विकलत्रयमांथी नीकळी पंचेन्द्रिय कदी थाय तो असंज्ञी – मनरहित थाय छे. त्यां स्व तथा परनो भेद जाणतो नथी. कदाचित् मनसहित संज्ञी पण थाय तो रुद्र तिर्यंच थाय छे अर्थात् बिल्ली, घुवड, सर्प, सिंह अने मच्छादि क्रूर तिर्यंच थाय छे.
भावार्थः — कदाचित् पंचेन्द्रिय थाय तो असंज्ञी थाय छे पण