बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा ]
संज्ञीपणुं दुर्लभ छे. वळी संज्ञी पण थाय तो त्यां क्रूर तिर्यंच थाय के जेना परिणाम निरंतर पापरूप ज रहे छे.
अर्थः — क्रूर तिर्यंच थाय तो ते तीव्र अशुभपरिणामथी अशुभ लेश्या सहित मरी नरकमां पडे छे. केवुं छे नरक? महा दुःखदायक अने भयानक छे. त्यां शरीरसंबंधी तथा मनसंबंधी प्रचुर (घणां तीव्र – आकरां) दुःख भोगवे छे.
हवे कहे छे के – ए नरकमांथी नीकळी तिर्यंच थाय तो त्यां पण दुःख सहे छेः —
अर्थः — ए नरकमांथी नीकळी फरी तिर्यंचगतिमां ऊपजे छे; त्यां पण जेम पापरूप थाय तेम आ जीव अनेक प्रकारनां अनंत दुःख विशेषता पूर्वक सहे छे.
हवे कहे छे के – मनुष्यपणुं पामवुं महादुर्लभ छे. त्यां पण मिथ्याद्रष्टि बनी पाप उपजावे छेः —