Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 288-290.

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बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा ]

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संज्ञीपणुं दुर्लभ छे. वळी संज्ञी पण थाय तो त्यां क्रूर तिर्यंच थाय के जेना परिणाम निरंतर पापरूप ज रहे छे.

हवे क्रूर परिणामीओनो नरकवास थाय छे एम कहे छेः
सो तिव्वअसुहलेसो णरये णिवडेइ दुक्खदे भीमे
तत्थ वि दुक्खं भुंजदि सारीरं माणसं पउरं ।।२८८।।
सः तीव्राशुभलेश्यः नरके निपतति दुःखदे भीमे
तत्र अपि दुःखं भुङ्क्ते शारीरं मानसं प्रचुरम् ।।२८८।।

अर्थःक्रूर तिर्यंच थाय तो ते तीव्र अशुभपरिणामथी अशुभ लेश्या सहित मरी नरकमां पडे छे. केवुं छे नरक? महा दुःखदायक अने भयानक छे. त्यां शरीरसंबंधी तथा मनसंबंधी प्रचुर (घणां तीव्र आकरां) दुःख भोगवे छे.

हवे कहे छे केए नरकमांथी नीकळी तिर्यंच थाय तो त्यां पण दुःख सहे छेः

तत्तो णीसरिदूणं पुणरवि तिरिएसु जायदे पावं
तत्थ वि दुक्खमणंतं विसहदि जीवो अणेयविहं ।।२८९।।
ततः निःसृत्य पुनरपि तिर्यक्षु जायते पापं
तत्र अपि दुःखं अनन्तं विषहते जीवः अनेकविधम् ।।२८९।।

अर्थःए नरकमांथी नीकळी फरी तिर्यंचगतिमां ऊपजे छे; त्यां पण जेम पापरूप थाय तेम आ जीव अनेक प्रकारनां अनंत दुःख विशेषता पूर्वक सहे छे.

हवे कहे छे केमनुष्यपणुं पामवुं महादुर्लभ छे. त्यां पण मिथ्याद्रष्टि बनी पाप उपजावे छेः

रयणं चउप्पहे पिव मणुयत्तं सुट्ठु दुल्लहं लहिय
मिच्छो हवेइ जीवो तत्थ वि पावं समज्जेदि ।।२९०।।