Swami Kartikeyanupreksha-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 291-292.

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[ स्वामिकार्त्तिकेयानुप्रेक्षा
रत्नं चतुष्पथे इव मनुजत्वं सुष्ठु दुर्लभं लब्ध्वा
म्लेच्छः भवति जीवः तत्र अपि पापं समर्जयति ।।२९०।।

अर्थःतिर्यंचमांथी नीकळी मनुष्यगति पामवी अति दुर्लभ छे. जेम चार पंथ वच्चे रत्न पडी गयुं होय तो ते महाभाग्य होय तो ज हाथमां आवे छे तेम (मानवपणुं) दुर्लभ छे. वळी आवो दुर्लभ मनुष्यदेह पामीने पण जीव मिथ्याद्रष्टि बनी पाप उपजावे छे.

भावार्थःमनुष्य पण कदाचित् थाय तो त्यां म्लेच्छखंड आदिमां वा मिथ्याद्रष्टिओनी संगतिमां ऊपजी पाप ज उपजावे छे.

हवे कहे छे केमनुष्य पण थाय अने ते आर्यखंडमां पण ऊपजे तोपण त्यां उत्तम कुळादि पामवां अति दुर्लभ छेः

अह लहदि अज्जवत्तं तह ण वि पावेइ उत्तमं गोत्तं
उत्तम कुले वि पत्ते धणहीणो जायदे जीवो ।।२९१।।
अथ लभते आर्यावर्तं तथा न अपि प्राप्नोति उत्तमं गोत्रम्
उत्तमकुले अपि प्राप्ते धनहीनः जायते जीवः ।।२९१।।

अर्थःमनुष्यपर्याय पामी कदाचित् आर्यखंडमां पण जन्म पामे तो त्यां उच्च कुळ पामवुं दुर्लभ छे. कदाचित् उच्च कुळमां पण जन्म पामे तो त्यां धनहीन दरिद्री थाय अने तेनाथी कांई सुकृत्य नहि बनतां पापमां ज लीन रहे छे.

अह धणसहिदो होदि हु इंदियपरिपुण्णदा तदो दुलहा
अह इंदियसंपुण्णो तह वि सरोओ हवे देहो ।।२९२।।
अथ धनसहितः भवति स्फु टं इन्द्रियपरिपूर्णता ततः दुर्ल्लभा
अथ इन्द्रियसम्पूर्णः तथापि सरोगः भवेत् देहः ।।२९२।।

अर्थःवळी जो धनवानपणुं पण पामे तो त्यां इन्द्रियोनी परिपूर्णता पामवी अति दुर्लभ छे. कदाचित् इन्द्रियोनी संपूर्णता पण पामे तो त्यां रोगसहित देह पामे, पण नीरोग होवुं दुर्लभ छे.