Tattvagyan Tarangini-Gujarati (Devanagari transliteration).

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अध्याय-१६ ][ १३५
अर्थ :जेओ हंमेशां शुद्ध चिद्रूपमां रक्त निर्जन स्थानमां वसे
छे ते वंदवायोग्य छे, ते गुणवान छे, ते धन्य छे अने ते तत्त्वोमां श्रेष्ठ
छे. १४.
ज्ञानी मनुष्य ध्यान अने स्वाध्यायना कारणरूप राग-द्वेष-मोहनो
नाश करनार सुखदायक निर्जन स्थाननुं सेवन करे छे. १५.
सुधाया लक्षणं लोका वदंति बहुधा मुधा
बाधाजंतुजनैर्मुक्तं स्थानमेव सतां सुधा ।।१६।।
भूमिगृहे समुद्रादितटे पितृवने वने
गुहादौ वसति प्राज्ञः शुद्धचिद्ध्यानसिद्धये ।।१७।।
लोक सुधाानुं लक्षण बहुधाा भाखे ते तो व्यर्थ तमाम,
संतासुधाा तो बाधाा जंतु जन विण निर्जन स्थाननुं नाम.
भूमिगृह वर सिंधाु तट पर, स्मशान वन गिरिग¯रमांय,
चिद्रूप धयाननी सिद्धि काजे प्राज्ञ वसे निर्जन स्थळमांय. १६-१७.
अर्थ :लोको सुधानुं लक्षण अनेक प्रकारे कहे छे, परंतु ते वृथा
छे. सत्पुरुषोने तो बाधारहित, जंतुरहित अने मनुष्य रहित एवुं स्थान
ते ज अमृत छे. १६.
तत्त्वज्ञानी शुद्ध आत्माना ध्याननी सिद्धि करवा माटे भोंयरामां
समुद्र आदिना कांठे, स्मशानमां; अरण्यमां के गुफा आदिमां वसे छे. १७.
विविक्तस्थानकाभावात् योगिनां जनसंगमः
तेषामालोकनेनैव वचसा स्मरणेन च ।।१८।।
जायते मनसः स्पंदस्ततो रागादयोऽखिलाः
तेभ्यः क्लेशो भवेत्तस्मान्नाशं याति विशुद्धता ।।१९।।
तया विना न जायेत शुद्धचिद्रूपचिंतनं
विना तेन न मुक्तिः स्यात् परमाखिलकर्मणां ।।२०।।