१४४ ][ तत्त्वज्ञान-तरंगिणी
शक्र चक्री के भवनवासीना £न्द्र तणा £न्द्रिय विषयो,
विकल्पकारक होवाथी त्यां आकुळता, सुख काांथी कहो?
ते सुखने तात्त्विक जे माने तथा वर्णवे ते रुपे,
अहा! भ्रान्ति मोटी तेओने मानुं भमावे भवकूपे. १८-१९.
अर्थ : — इन्द्रोना, चक्रवर्तीओना, सर्व भवनवासी देवोना,
इन्द्रोना विकल्पना (रागादिनां) साधन एवा इन्द्रियविषयोथी सुख
क्यांथी होय? केम के त्यां व्याकुळता छे. १८.
तेओना सुखने जे तात्त्विक (साचुं) गणे छे अने कहे छे, तेमने
महान भ्रांति उपजी छे, एम हुं मानुं छुं. १९.
विमुच्य रागादि निजं तु निर्जने
पदे स्थिरतानां सुखमत्र योगिनां ।
विवेकिनां शुद्धचिदात्मचेतसां
विदां यदा स्यान्न हि कस्यचित्तथा ।।२०।।
(शिखरणी)
तजी रागादिने विजन पदमां स्थिति धारता,
अहा! ज्ञानी नित्ये स्वकीय परनो भेद करता;
विवेका ए चित्ते सहज निजरुपे रत रहे,
वरे योगी तेवुं निज सुख कदी अन्य न लहे. २०.
अर्थ : — रागादिनो त्याग करी, निर्जनस्थळमां स्थिति करनारने,
योगीओने, जड चेतनना भेदज्ञानरूप विवेकवाळाओने, शुद्ध
आत्मस्वरूपमां जेमनुं चित्त लीन छे एवाओने, आत्मज्ञानीओने अहीं
जेवुं आत्मिक सुख प्रगट थाय छे, तेवुं (बीजा) कोईने प्रगटवुं संभवतुं
नथी. २०.