
करीने तेमां ठर–ए ज तारुं खरुं कार्य छे, आ सिवाय परनां कार्य तारां
नथी. स्वभावमांथी पूर्णता प्रगट करीने कृतकृत्य थई शके, पण परनां
कार्यो पूरा करीने कृतकृत्यपणुं थाय–एम बनी शकतुं नथी. आत्मामां ज
आनंद छे एवो जेणे निर्णय न कर्यो ते भले पुण्य करीने स्वर्गमां जाय–तो
पण अकृतकृत्य ज छे.
कहे छे अने तेनुं फळ अमृत छे एटले के तेमां कहेला यथार्थ भावोनो बोध करतां अमर एवा
मोक्षपदनी प्राप्ति थाय छे. अहीं तेनो निश्चय–पंचाशत अधिकार वंचाय छे; तेनी तेरमी
गाथामां कहे छे के–
तत्तत्र तत्परो यः स एव तल्लब्धि कृतकृत्यः।।
आदि रत्नत्रयनी प्राप्ति थाय छे अने ते कृतकृत्य थई जाय छे.
ज्ञान–आनंदस्वभावनी प्रतीति जीवे पूर्वे कदी करी नथी. जेम कोई माणसना एक हाथमां
चिंतामणि होय ने बीजा हाथमां पथ्थरो होय, त्यां चिंतामणि पासे जे चिंतवे ते मळे, तेनी
प्रतीत तो करे नहि, ने पथ्थरथी मने सुख छे एम मानीने तेने पकडी राखे तो लोकमां तेने
मूर्ख कहेवाय छे. तेम आत्मानो ज्ञानानंद स्वभाव चैतन्यचिंतामणि छे, ते स्वभावमां अंतर्मुख
द्रष्टि करे तो आत्माने आनंदनो अनुभव थाय ने ते कृतकृत्य थई जाय. पण आवा पोताना
स्वभावनी तो प्रतीत जीव करतो नथी, ने बहारना पदार्थोमां मारुं सुख छे एम मानीने परनी
ममता करीने दुःखी थाय छे. परचीज तो पोतानी थई शकती नथी, छतां अनादिथी परने
पोतानुं करवा मथी रह्यो छे. त्यां तो तेनो प्रयत्न व्यर्थ छे अने आत्मा ज्ञानानंद–स्वभावथी
भरेलो छे तेनी सन्मुख थईने एकाग्रता