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पुनरन्यः । तथा हि — यदा नामानादिप्रसिद्धपौद्गलिककर्मबन्धनोपाधिसंनिधिप्रधावितोपराग- रंजितात्मवृत्तिर्जपापुष्पसंनिधिप्रधावितोपरागरंजितात्मवृत्तिः स्फ टिकमणिरिव परारोपित- विकारोऽहमासं संसारी, तदापि न नाम मम कोऽप्यासीत् । तदाप्यहमेक एवोपरक्तचित्स्वभावेन स्वतन्त्रः कर्तासम् । अहमेक एवोपरक्तचित्स्वभावेन साधकतमः करणमासम् । अहमेक एवोपरक्तचित्परिणमनस्वभावेनात्मना प्राप्यः कर्मासम् । अहमेक एव चोपरक्तचित्परिणमन- स्वभावस्य निष्पाद्यं सौख्यविपर्यस्तलक्षणं दुःखाख्यं कर्मफलमासम् । इदानीं पुनरनादि- रागादिविकल्परहितस्वसंवेदनज्ञानपरिणतिबलेन । कम्मं शुद्धबुद्धैकस्वभावेन परमात्मना प्राप्यं व्याप्यमहमेक एव कर्मकारकमस्मि । फलं च शुद्धज्ञानदर्शनस्वभावपरमात्मनः साध्यं निष्पाद्यं निज- शुद्धात्मरुचिपरिच्छित्तिनिश्चलानुभूतिरूपाभेदरत्नत्रयात्मकपरमसमाधिसमुत्पन्नसुखामृतरसास्वादपरिणति- रूपमहमेक एव फलं चास्मि । णिच्छिदो एवमुक्तप्रकारेण निश्चितमतिः सन् समणो सुखदुःख- जीवितमरणशत्रुमित्रादिसमताभावनापरिणतः श्रमणः परममुनिः परिणमदि णेव अण्णं जदि परिणमति
‘‘जब अनादिसिद्ध पौद्गलिक कर्मकी बन्धनरूप उपाधिकी निकटतासे उत्पन्न हुए निकटतासे उत्पन्न हुये उपरागसे (लालिमासे) जिसकी स्वपरिणति रंजित (-रँगी हुई) हो ऐसे स्फ टिक मणिकी भाँति — परके द्वारा २आरोपित विकारवाला होनेसे, संसारी था, तब भी (अज्ञानदशामें भी) वास्तवमें मेरा कोई भी (संबंधी) नहीं था । तब भी मैं अकेला ही ३कर्ता था, क्योंकि मैं अकेला ही उपरक्त चैतन्यरूप स्वभावसे स्वतंत्र था (अर्थात् स्वाधीनतया कर्ता था); मैं अकेला ही करण था, क्योंकि मैं अकेला ही उपरक्त चैतन्यरूप स्वभावके द्वारा साधकतम (-उत्कृष्टसाधन) था; मैं अकेला ही कर्म था, क्योंकि मैं अकेला ही उपरक्त चैतन्यरूप परिणमित होनेके स्वभावके कारण आत्मासे प्राप्य (-प्राप्त होने योग्य) था; और मैं अकेला ही सुखसे विपरीत लक्षणवाला, ‘दुःख’ नामक कर्मफल था — जो कि (फल) उपरक्त चैतन्यरूप (फल) परिणमित होनेके स्वभावसे उत्पन्न किया जाता था ।
और अब, अनादिसिद्ध पौद्गलिक कर्म की बंधनरूप उपाधिकी निकटताके नाशसे जिसकी सुविशुद्ध सहज (-स्वाभाविक) स्वपरिणति प्रगट हुई है ऐसा मैं – जपाकुसुमकी
१उपरागके द्वारा जिसकी स्वपरिणति रंजित (विकृत, मलिन) थी ऐसा मैं — जपाकुसुमकी
१. उपराग = किसी पदार्थमें, अन्य उपाधिकी समीपताके निमित्तसे होनेवाला उपाधिके अनुरूप विकारी भाव; औपाधिकभाव; विकार; मलिनता ।
२. आरोपित = (नवीन अर्थात् औपाधिकरूपसे) किये गये । [विकार स्वभावभूत नहीं थे, किन्तु उपाधिके निमित्तसे औपाधिकरूपसे (नवीन) हुए थे । ]
३. कर्ता, करण और कर्मके अर्थोंके लिये १६ वीं गाथाका भावार्थ देखना चाहिये ।
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प्रसिद्धपौद्गलिककर्मबन्धनोपाधिसन्निधिध्वंसविस्फु रितसुविशुद्धसहजात्मवृत्तिर्जपापुष्पसंनिधिध्वंस- विस्फु रितसुविशुद्धसहजात्मवृत्तिः स्फ टिकमणिरिव विश्रान्तपरारोपितविकारोऽहमेकान्तेनास्मि मुमुक्षुः । इदानीमपि न नाम मम कोऽप्यस्ति । इदानीमप्यहमेक एव सुविशुद्धचित्स्वभावेन स्वतन्त्रः कर्तास्मि; अहमेक एव च सुविशुद्धचित्स्वभावेन साधकतमः करणमस्मि; अहमेक एव च सुविशुद्धचित्परिणमनस्वभावेनात्मना प्राप्यः कर्मास्मि; अहमेक एव च सुविशुद्ध- चित्परिणमनस्वभावस्य निष्पाद्यमनाकुलत्वलक्षणं सौख्याख्यं कर्मफलमस्मि । एवमस्य बन्धपद्धतौ मोक्षपद्धतौ चात्मानमेकमेव भावयतः परमाणोरिवैकत्वभावनोन्मुखस्य नैवान्यं रागादिपरिणामं यदि चेत्, अप्पाणं लहदि सुद्धं तदात्मानं भावकर्मद्रव्यकर्मनोकर्मरहितत्वेन शुद्धं शुद्धबुद्धैकस्वभावं लभते प्राप्नोति इत्यभिप्रायो भगवतां श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवानाम् ।।१२६।। एवमेक- निकटताके नाशसे जिसकी सुविशुद्ध सहज स्वपरिणति प्रगट हुई हो ऐसे स्फ टिकमणिकी भाँति — जिसका परके द्वारा आरोपित विकार रुक गया है ऐसा होनेसे एकान्ततः मुमुक्षु (केवल मोक्षार्थी) हूँ; अभी भी (-मुमुक्षुदशामें अर्थात् ज्ञानदशामें भी) वास्तवमें मेरा कोई भी नहीं है । अभी भी मैं अकेला ही कर्ता हूँ; क्योंकि मैं अकेला ही सुविशुद्ध चैतन्यस्वरूप स्वभावसे स्वतन्त्र हूँ, (अर्थात् स्वाधीनतया कर्ता हूँ); मैं अकेला ही करण हूँ, क्योंकि मैं अकेला ही सुविशुद्ध चैतन्यरूप स्वभावसे साधकतम हूँ; मैं अकेला ही कर्म हूँ, क्योंकि मैं अकेला ही सुविशुद्ध चैतन्यरूप परिणमित होनेके स्वभावके कारण आत्मासे प्राप्य हूँ और मैं अकेला ही अनाकुलता लक्षणवाला, ‘सुख’ नामक कर्मफल हूँ — जो कि (फल) १सुविशुद्ध चैतन्यरूप परिणमित होनेके स्वभावसे उत्पन्न किया जाता है ।’’
— इसप्रकार बंधमार्गमें तथा मोक्षमार्गमें आत्मा अकेला ही है इसप्रकार २भानेवाला यह पुरुष परमाणुकी भाँति एकत्वभावनामें उन्मुख होनेसे, (अर्थात् एकत्वके भानेमें तत्पर होनेसे), उसे परद्रव्यरूप परिणति किंचित् नहीं होती; और परमाणुकी भाँति (जैसे प्र ३२
१. सुविशुद्धचैतन्यपरिणमनस्वभाव आत्माका कर्म है, और वह कर्म अनाकुलतास्वरूप सुखको उत्पन्न करता है, इसलिये सुख वह कर्मफल है । सुख आत्माकी अवस्था होनेसे आत्म ही कर्मफल है ।
२. भाना = अनुभव करना; समझना; चिन्तवन करना [‘किसी जीवका — अज्ञानी या ज्ञानीका — परके साथ सम्बन्ध नहीं है । बंधमार्गमें आत्मा स्वयं निजको निजसे बाँधता था और निजको (अर्थात् अपने दुःखपर्यायरूप फलको) भोगता था । अब मोक्षमार्गमें आत्मा स्वयं निजको निजसे मुक्त करता है और निजको (अर्थात् अपने सुखपर्यायरूप फलको) भोगता है । — ऐसे एकत्वको सम्यग्दृष्टि जीव भाता है – अनुभव करता है – समझता है – चिन्तवन करता है । मिथ्यादृष्टि इससे विपरीतभावनावाला होता है । ]
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परद्रव्यपरिणतिर्न जातु जायते । परमाणुरिव भावितैकत्वश्च परेण नो संपृच्यते । ततः परद्रव्यासंपृक्तत्वात्सुविशुद्धो भवति । कर्तृकरणक र्मकर्मफलानि चात्मत्वेन भावयन् पर्यायैर्न संकीर्यते; ततः पर्यायासंकीर्णत्वाच्च सुविशुद्धो भवतीति ।।१२६।।
लुण्टाक उत्कटविवेकविविक्ततत्त्वः ।।७।।
सूत्रेण पञ्चमस्थलं गतम् । इति सामान्यज्ञेयाधिकारमध्ये स्थलपञ्चकेन भेदभावना गता । इत्युक्त- प्रकारेण ‘तम्हा तस्स णमाइं’ इत्यादिपञ्चत्रिंशत्सूत्रैः सामान्यज्ञेयाधिकारव्याख्यानं समाप्तम् । इत ऊर्ध्वमेकोनविंशतिगाथाभिर्जीवाजीवद्रव्यादिविवरणरूपेण विशेषज्ञेयव्याख्यानं करोति । तत्राष्टस्थलानि भवन्ति । तेष्वादौ जीवाजीवत्वकथनेन प्रथमगाथा, लोकालोकत्वकथनेन द्वितीया, सक्रियनिःक्रियत्व- एकत्वभावसे परिणमित परमाणु परके साथ संगको प्राप्त नहीं होता; उसी प्रकार–) एकत्वको भानेवाला पुरुष परके साथ १संपृक्त नहीं होता, इसलिये परद्रव्यके साथ असंबद्धताके कारण वह सुविशुद्ध होता है । और कर्ता, करण, कर्म तथा कर्मफलको २आत्मारूपसे भाता हुआ वह पुरुष पर्यायोंसे संकीर्ण (-खंडित) नहीं होता; और इसलिये पर्यायोंके द्वारा संकीर्ण न होनेसे सुविशुद्ध होता है ।।१२६।।
[अब, श्लोक द्वारा इसी आशयको व्यक्त करके शुद्धनयकी महिमा करते हैं : — ]
अर्थ : — जिसने अन्य द्रव्यसे भिन्नताके द्वारा आत्माको एक ओर हटा लिया है (अर्थात् परद्रव्योंसे अलग दिखाया है ) तथा जिसने समस्त विशेषोंके समूहको सामान्यमें लीन किया है (अर्थात् समस्त पर्यायोंको द्रव्यके भीतर डूबा हुआ दिखाया है ) — ऐसा जो यह, उद्धत मोहकी लक्ष्मीको (-ऋद्धिको, शोभाको) लूँट लेनेवाला शुद्धनय है, उसने उत्कट विवेकके द्वारा तत्त्वको (आत्मस्वरूपको) ३विविक्त किया है ।
[अब शुद्धनयके द्वारा शुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त करनेवाले आत्माकी महिमा श्लोक द्वारा कहकर, द्रव्यसामान्यके वर्णनकी पूर्णाहुति की जाती है : — ]
१. संपृक्त = संपर्कवाला; संबंधवाला; संगवाला ।
२. सम्यग्दृष्टि जीव भेदोंको न भाकर अभेद आत्माको ही भाता — अनुभव करता है ।
३. विविक्त = शुद्ध; अकेला; अलग ।
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भ्रान्तिध्वंसादपि च सुचिराल्लब्धशुद्धात्मतत्त्वः ।
स्थास्यत्युद्यत्सहजमहिमा सर्वदा मुक्त एव ।।८।।
इति प्रवचनसारवृत्तौ तत्त्वदीपिकायां श्रीमदमृतचंद्रसूरिविरचितायां ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापने द्रव्यसामान्यप्रज्ञापनं समाप्तम् ।। व्याख्यानेन तृतीया चेति । ‘दव्वं जीवमजीवं’ इत्यादिगाथात्रयेण प्रथमस्थलम् । तदनन्तरं ज्ञानादि- विशेषगुणानां स्वरूपकथनेन ‘लिंगेहिं जेहिं’ इत्यादिगाथाद्वयेन द्वितीयस्थलम् । अथानन्तरं स्वकीय- स्वकीयविशेषगुणोपलक्षितद्रव्याणां निर्णयार्थं ‘वण्णरस’ इत्यादिगाथात्रयेण तृतीयस्थलम् । अथ पञ्चास्तिकायकथनमुख्यत्वेन ‘जीवा पोग्गलकाया’ इत्यादिगाथाद्वयेन चतुर्थस्थलम् । अतः परं द्रव्याणां लोकाकाशमाधार इति कथनेन प्रथमा, यदेवाकाशद्रव्यस्य प्रदेशलक्षणं तदेव शेषाणामिति कथनरूपेण द्वितीया चेति ‘लोगालोगेसु’ इत्यादिसूत्रद्वयेन पञ्चमस्थलम् । तदनन्तरं कालद्रव्यस्याप्रदेशत्वस्थापनरूपेण प्रथमा, समयरूपः पर्यायकालः कालाणुरूपो द्रव्यकाल इति कथनरूपेण द्वितीया चेति ‘समओ दु अप्पदेसो’ इत्यादिगाथाद्वयेन षष्ठस्थलम् । अथ प्रदेशलक्षणकथनेन प्रथमा, तिर्यक्प्रचयोर्ध्वप्रचयस्वरूप-
अर्थ : — इसप्रकार परपरिणतिके उच्छेदसे (अर्थात् परद्रव्यरूप परिणमनके नाशसे) तथा कर्ता, कर्म इत्यादि भेदोंकी भ्रांतिके भी नाशसे अन्तमें जिसने शुद्ध आत्मतत्त्वको उपलब्ध किया है — ऐसा यह आत्मा, चैतन्यमात्ररूप विशद (निर्मल) तेजमें लीन होता हुआ, अपनी सहज (स्वाभाविक) महिमाके प्रकाशमानरूपसे सर्वदा मुक्त ही रहेगा ।
[अब, श्लोक द्वारा नवीन विषयको — द्रव्यविशेषके वर्णनको — सूचित किया जाता है : — ]
अर्थ : — इसप्रकार द्रव्यसामान्यके ज्ञानसे मनको गंभीर करके, अब द्रव्यविशेषके
इसप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत) श्री प्रवचनसार शास्त्रकी श्रीमद् अमृतचंद्राचार्यदेव विरचित तत्त्वदीपिका नामकी टीकामें ज्ञेयतत्त्व – प्रज्ञापनमें द्रव्यसामान्यप्रज्ञापन समाप्त हुआ ।
१परिज्ञानका प्रारंभ किया जाता है ।
१. परिज्ञान = विस्तारपूर्वक ज्ञान ।
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इह हि द्रव्यमेकत्वनिबन्धनभूतं द्रव्यत्वसामान्यमनुज्झदेव तदधिरूढविशेषलक्षण- सद्भावादन्योन्यव्यवच्छेदेन जीवाजीवत्वविशेषमुपढौकते । तत्र जीवस्यात्मद्रव्यमेवैका व्यक्तिः । अजीवस्य पुनः पुद्गलद्रव्यं धर्मद्रव्यमधर्मद्रव्यं कालद्रव्यमाकाशद्रव्यं चेति पंच व्यक्तयः । कथनेन द्वितीया चेति ‘आगासमणुणिविट्ठं’ इत्यादिसूत्रद्वयेन सप्तमस्थलम् । तदनन्तरं कालाणुरूपद्रव्यकाल- स्थापनरूपेण ‘उप्पादो पद्धंसो’ इत्यादिगाथात्रयेणाष्टमस्थलमिति विशेषज्ञेयाधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा — अथ जीवाजीवलक्षणमावेदयति — दव्वं जीवमजीवं द्रव्यं जीवाजीवलक्षणं भवति । जीवो पुण चेदणो जीवः पुनश्चेतनः स्वतःसिद्धया बहिरङ्गकारणनिरपेक्षया बहिरन्तश्च प्रकाशमानया नित्यरूपया निश्चयेन परमशुद्धचेतनया, व्यवहारेण पुनरशुद्धचेतनया च युक्तत्वाच्चेतनो भवति । पुनरपि किंविशिष्टः ।
अब, द्रव्यविशेषका प्रज्ञापन करते हैं (अर्थात् द्रव्यविशेषोंको – द्रव्यको भेदोंको – बतलाते हैं ) । उसमें (प्रथम), द्रव्यके जीव -अजीवपनेरूप विशेषको निश्चित करते हैं, (अर्थात् द्रव्यके जीव और अजीव – ऐसे दो भेद बतलाते हैं ) : —
अन्वयार्थ : — [द्रव्यं ] द्रव्य [जीवः अजीवः ] जीव और अजीव है । [पुनः ] उसमें [चेतनोपयोगमयः ] चेतनामय तथा उपयोगमय सो [जीवः ] जीव है, [च ] और [पुद्गलद्रव्यप्रमुखः अचेतनः ] पुद्गलद्रव्यादिक अचेतन द्रव्य वे [अजीवः भवति ] अजीव हैं ।।१२७।।
टीका : — यहाँ (इस विश्वमें) द्रव्य, एकत्वके कारणभूत द्रव्यत्वसामान्यको छोड़े बिना ही, उसमें रहे हुए विशेषलक्षणोंके सद्भावके कारण एक -दूसरेसे पृथक् किये जानेपर जीवत्वरूप और अजीवत्वरूप विशेषको प्राप्त होता है । उसमें, जीवका आत्मद्रव्य ही एक भेद है; और अजीवके पुद्गल द्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, कालद्रव्य तथा आकाशद्रव्य — यह पाँच भेद हैं । जीवका विशेषलक्षण चेतना -उपयोगमयत्व (चेतनामयपना और उपयोगमयपना) है;
छे द्रव्य जीव, अजीव; चित -उपयोगमय ते जीव छे; पुद्गलप्रमुख जे छे अचेतन द्रव्य, तेह अजीव छे. १२७.
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विशेषलक्षणं जीवस्य चेतनोपयोगमयत्वं; अजीवस्य पुनरचेतनत्वम् । तत्र यत्र स्वधर्मव्यापक- त्वात्स्वरूपत्वेन द्योतमानयानपायिन्या भगवत्या संवित्तिरूपया चेतनया, तत्परिणामलक्षणेन द्रव्यवृत्तिरूपेणोपयोगेन च निर्वृत्तत्वमवतीर्णं प्रतिभाति स जीवः । यत्र पुनरुपयोगसहचरिताया यथोदितलक्षणायाश्चेतनाया अभावाद् बहिरन्तश्चाचेतनत्वमवतीर्णं प्रतिभाति सोऽजीवः ।।१२७।।
उवओगमओ उपयोगमयः अखण्डैकप्रतिभासमयेन सर्वविशुद्धेन केवलज्ञानदर्शनलक्षणेनार्थग्रहणव्यापार- रूपेण निश्चयनयेनेत्थंभूतशुद्धोपयोगेन, व्यवहारेण पुनर्मतिज्ञानाद्यशुद्धोपयोगेन च निर्वृत्तत्वान्निष्पन्न- त्वादुपयोगमयः । पोग्गलदव्वप्पमुहं अचेदणं हवदि अज्जीवं पुद्गलद्रव्यप्रमुखमचेतनं भवत्यजीवद्रव्यं; पुद्गलधर्माधर्माकाशकालसंज्ञं द्रव्यपञ्चकं पूर्वोक्तलक्षणचेतनाया उपयोगस्य चाभावादजीवमचेतनं और अजीवका, (विशेष लक्षण) अचेतनपना है । वहाँ (जीवके) स्वधर्मोंमें व्यापनेवाली होनेसे (जीवके) स्वस्वरूपसे प्रकाशित होती हुई, अविनाशिनी, भगवती, संवेदनरूप चेतनाके द्वारा तथा चेतनापरिणामलक्षण, १द्रव्यपरिणतिरूप उपयोगके द्वारा जिसमें निष्पन्नपना (-रचनारूपपना) अवतरित प्रतिभासित होता है, वह जीव है और जिसमें उपयोगके साथ रहनेवाली, २यथोक्त लक्षणवाली चेतनाका अभाव होनेसे बाहर तथा भीतर अचेतनपना अवतरित प्रतिभासित होता है, वह अजीव है ।
भावार्थ : — द्रव्यत्वरूप सामान्यकी अपेक्षासे द्रव्योंमें एकत्व है तथापि विशेष लक्षणोंकी अपेक्षासे उनके जीव और अजीव ऐसे दो भेद हैं । जो (द्रव्य) भगवती चेतनाके द्वारा और चेतनाके परिणामस्वरूप उपयोग द्वारा रचित है वह जीव है, और जो (द्रव्य) चेतनारहित होनेसे अचेतन है वह अजीव है । जीवका एक ही भेद है; अजीवके पांच भेद हैं, इन सबका विस्तृत विवेचन आगे किया जायगा ।।१२७।।
अब (द्रव्यके) लोकालोकस्वरूप विशेष (-भेद) निश्चित करते हैं : —
आकाशमां जे भाग धर्म -अधर्म -काळ सहित छे, जीव -पुद्गलोथी युक्त छे, ते सर्वकाळे लोक छे. १२८.
१. चेतनाका परिणामस्वरूप उपयोग जीवद्रव्यकी परिणति है ।
२. यथोक्त लक्षणवाली = ऊ पर कहे अनुसार लक्षणवाली (चेतनाका लक्षण ऊ पर ही कहनेमें आया है ।)
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अस्ति हि द्रव्यस्य लोकालोकत्वेन विशेषविशिष्टत्वं स्वलक्षणसद्भावात् । स्वलक्षणं हि लोकस्य षड्द्रव्यसमवायात्मकत्वं, अलोकस्य पुनः केवलाकाशात्मकत्वम् । तत्र सर्वद्रव्य- व्यापिनि परममहत्याकाशे यत्र यावति जीवपुद्गलौ गतिस्थितिधर्माणौ गतिस्थिती आस्कन्दतः तद्गतिस्थितिनिबन्धनभूतौ च धर्माऽधर्मावभिव्याप्यावस्थितौ, सर्वद्रव्यवर्तनानिमित्तभूतश्च कालो नित्यदुर्ललितस्तत्तावदाकाशं शेषाण्यशेषाणि द्रव्याणि चेत्यमीषां समवाय आत्मत्वेन स्वलक्षणं भवतीत्यर्थः ।।१२७।। अथ लोकालोकरूपेण पदार्थस्य द्वैविध्यमाख्याति — पोग्गलजीवणिबद्धो अणु- स्कन्धभेदभिन्नाः पुद्गलास्तावत्तथैवामूर्तत्वातीन्द्रियज्ञानमयत्वनिर्विकारपरमानन्दैकसुखमयत्वादिलक्षणा जीवाश्चेत्थंभूतजीवपुद्गलैर्निबद्धः संबद्धो भृतः पुद्गलजीवनिबद्धः । धम्माधम्मत्थिकायकालड्ढो धर्मा- धर्मास्तिकायौ च कालश्च धर्माधर्मास्तिकायकालास्तैराढयो भृतो धर्माधर्मास्तिकायकालाढयः । जो यः एतेषां पञ्चानामित्थंभूतसमुदायो राशिः समूहः । वट्टदि वर्तते । कस्मिन् । आगासे अनन्ता- नन्ताकाशद्रव्यस्य मध्यवर्तिनि लोकाकाशे । सो लोगो स पूर्वोक्तपञ्चानां समुदायस्तदाधारभूतं लोकाकाशं चेति षड्द्रव्यसमूहो लोको भवति । क्व । सव्वकाले दु सर्वकाले तु । तद्बहिर्भूतमनन्तानन्ताकाशमलोक इत्यभिप्रायः ।।१२८।। अथ द्रव्याणां सक्रियनिःक्रियत्वेन भेदं दर्शयतीत्येका पातनिका, द्वितीया तु जीवपुद्गलयोरर्थव्यञ्जनपर्यायौ द्वौ शेषद्रव्याणां तु
अन्वयार्थ : — [आकाशे ] आकाशमें [यः ] जो भाग [पुद्गलजीवनिबद्धः ] जीव और पुद्गलसे संयुक्त [धर्माधर्मास्तिकायकालाढयः वर्तते ] तथा धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय और कालसे समृद्ध है, [सः ] वह [सर्वकाले तु ] सर्वकालमें [लोकः ] लोक है । (शेष केवल आकाश वह अलोक है ।)
टीका : — वास्तवमें द्रव्य लोकत्व और अलोकत्वके भेदसे विशेषवान है, क्योंकि अपने -अपने लक्षणोंका सद्भाव है । लोकका स्वलक्षण षड्द्रव्यसमवायात्मकपना (-छह द्रव्योंका समुदायस्वरूपपना) है और अलोकका केवल आकाशात्मकपना (-मात्र आकाशस्वरूपपना) है । वहाँ, सर्व द्रव्योंमें व्याप्त होने वाले परम महान आकाशमें, जहाँ जितनेमें गतिस्थिति धर्मवाले जीव तथा पुद्गल गति -स्थितिको प्राप्त होते हैं, (जहाँ जितनेमें) उन्हें, गति -स्थितिमें निमित्तभूत धर्म तथा अधर्म व्याप्त होकर रहते हैं और (जहाँ जितनेमें) सर्व द्रव्योंको वर्तनामें निमित्तभूत काल सदा वर्तता है, वह उतना आकाश तथा शेष समस्त
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यस्य स लोकः । यत्र यावति पुनराकाशे जीवपुद्गलयोर्गतिस्थिती न संभवतो, धर्माधर्मौ नावस्थितौ, न कालो दुर्ललितस्तावत्केवलमाकाशमात्मत्वेन स्वलक्षणं यस्य सोऽलोकः ।।१२८।।
उप्पादट्ठिदिभंगा पोग्गलजीवप्पगस्स लोगस्स ।
मुख्यवृत्त्यार्थपर्याय इति व्यवस्थापयति — जायंते जायन्ते । के कर्तारः । उप्पादट्ठिदिभंगा उत्पाद- स्थितिभङ्गाः । कस्य संबन्धिनः । लोगस्स लोकस्य । किंविशिष्टस्य । पोग्गलजीवप्पगस्स पुद्गल- जीवात्मकस्य, पुद्गलजीवावित्युपलक्षणं षड्द्रव्यात्मकस्य । कस्मात्सकाशात् जायन्ते । परिणामादो परिणामात् एकसमयवर्तिनोऽर्थपर्यायात् । संघादादो व भेदादो न केवलमर्थपर्यायात्सकाशाज्जायन्ते जीव- पुद्गलानामुत्पादादयः संघाताद्वा, भेदाद्वा व्यञ्जनपर्यायादित्यर्थः । तथाहि — धर्माधर्माकाशकालानां मुख्यवृत्त्यैकसमयवर्तिनोऽर्थपर्याया एव, जीवपुद्गलानामर्थपर्यायव्यञ्जनपर्यायाश्च । कथमिति चेत् । द्रव्य — उनका समुदाय जिसका १स्वपनेसे स्वलक्षण है, वह लोक है; और जहाँ जितने आकाशमें जीव तथा पुद्गलकी गति -स्थिति नहीं होती, धर्म तथा अधर्म नहीं रहते और काल नहीं वर्तता, उतना केवल आकाश जिसका स्व -पनेसे स्वलक्षण है, वह अलोक है ।।१२८।।
अब, ‘क्रिया’ रूप और ‘भाव’ रूप ऐसे जो द्रव्यके भाव हैं उनकी अपेक्षासे द्रव्यका विशेष (-भेद) निश्चित करते हैं : —
अन्वयार्थ : — [पुद्गलजीवात्मकस्य लोकस्य ] पुद्गल -जीवात्मक लोकके [परिणामात् ] परिणमनसे और [संघातात् वा भेदात् ] संघात (मिलने) और भेद (पृथक् होने) से [उत्पादस्थितिभंगाः ] उत्पाद, ध्रौव्य और व्यय [जायन्ते ] होते हैं ।।१२९।।
उत्पाद, व्यय ने ध्रुवता जीवपुद्गलात्मक लोकने परिणाम द्वारा, भेद वा संघात द्वारा थाय छे. १२९
१. स्वपनेसे = निजरूपसे (षड्द्रव्यसमुदाय ही लोक है, अर्थात् वही लोकका स्वत्व है — स्वरूप है । इसलिये लोकके स्वपनेसे षट्द्रव्योंका समुदाय लोकका स्वलक्षण है ।)
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क्रियाभाववत्त्वेन केवलभाववत्त्वेन च द्रव्यस्यास्ति विशेषः । तत्र भाववन्तौ क्रियावन्तौ च पुद्गलजीवौ, परिणामाद्भेदसंघाताभ्यां चोत्पद्यमानावतिष्ठमानभज्यमानत्वात् । शेषद्रव्याणि तु भाववन्त्येव, परिणामादेवोत्पद्यमानावतिष्ठमानभज्यमानत्वादिति निश्चयः । तत्र परिणाम- मात्रलक्षणो भावः, परिस्पन्दनलक्षणा क्रिया । तत्र सर्वाण्यपि द्रव्याणि परिणामस्वभावत्वात् परिणामेनोपात्तान्वयव्यतिरेकाण्यवतिष्ठमानोत्पद्यमानभज्यमानानि भाववन्ति भवन्ति । पुद्गलास्तु परिस्पन्दस्वभावत्वात्परिस्पन्देन भिन्नाः संघातेन, संहताः पुनर्भेदेनोत्पद्यमानाव- तिष्ठमानभज्यमानाः क्रियावन्तश्च भवन्ति । तथा जीवा अपि परिस्पन्दस्वभावत्वात्परिस्पन्देन प्रतिसमयपरिणतिरूपा अर्थपर्याया भण्यन्ते । यदा जीवोऽनेन शरीरेण सह भेदं वियोगं त्यागं कृत्वा भवान्तरशरीरेण सह संघातं मेलापकं करोति तदा विभावव्यञ्जनपर्यायो भवति, तस्मादेव भवान्तरसंक्रमणात्सक्रियत्वं भण्यते । पुद्गलानां तथैव विवक्षितस्कन्धविघटनात्सक्रियत्वेन स्कन्धान्तर- संयोगे सति विभावव्यञ्जनपर्यायो भवति । मुक्तजीवानां तु निश्चयरत्नत्रयलक्षणेन परमकारणसमय- सारसंज्ञेन निश्चयमोक्षमार्गबलेनायोगिचरमसमये नखकेशान्विहाय परमौदारिकशरीरस्य विलीयमान- रूपेण विनाशे सति केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टयव्यक्तिलक्षणेन परमकार्यसमयसाररूपेण स्वभावव्यञ्जन- पर्यायेण कृत्वा योऽसावुत्पादः स भेदादेव भवति, न संघातात् । कस्मादिति चेत् शरीरान्तरेण सह
टीका : — कोई द्रव्य ‘भाव’ तथा ‘क्रियावाले’ होनेसे और कोई द्रव्य केवल ‘भाव’ वाले होनेसे, – इस अपेक्षासे द्रव्यका विशेष (भेद) है । वहाँ पुद्गल तथा जीव (१) भाववाले तथा (२) क्रियावाले हैं, क्योंकि (१) परिणाम द्वारा तथा (२) संघात और भेदके द्वारा वे उत्पन्न होते हैं, टिकते हैं और नष्ट होते हैं । शेष द्रव्य तो भाववाले ही हैं, क्योंकि वे परिणामके द्वारा ही उत्पन्न होते हैं, टिकते है और नष्ट होते हैं — ऐसा निश्चय है ।
उसमें, ‘भाव’का लक्षण परिणाममात्र है; ‘क्रिया’ का लक्षण परिस्पंद (-कम्पन) है । वहाँ समस्त ही द्रव्य भाववाले हैं, क्योंकि परिणामस्वभाववाले होनेसे परिणामके द्वारा १अन्वय और व्यतिरेकोंको प्राप्त होते हुए वे उत्पन्न होते हैं, टिकते हैं और नष्ट होते हैं । पुद्गल तो (भाववाले होनेके अतिरिक्त) क्रियावाले भी होते हैं, क्योंकि परिस्पंदस्वभाववाले होनेसे परिस्पंदके द्वारा २पृथक् पुद्गल एकत्रित हो जाते हैं, इसलिये और एकत्रित – मिले हुए पुद्गल पुनः पृथक् हो जाते हैं, इसलिये (इस अपेक्षासे) वे उत्पन्न होते हैं, टिकते हैं और नष्ट होते हैं । तथा जीव भी भाववाले होनेके अतिरिक्त) क्रियावाले भी होते हैं, क्योंकि
१. अन्वय, स्थायीपनेको और व्यतिरेक, उत्पाद तथा व्ययपनेको बतलाते हैं ।
२. पृथक् पुद्गल कंपनके द्वारा एकत्रित होते हैं । वहाँ वे भिन्नपनेसे नष्ट हुए, पुद्गलपनेसे टिके और एकत्रपनेसे उत्पन्न हुए ।
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नूतनकर्मनोकर्मपुद्गलेभ्यो भिन्नास्तैः सह संघातेन, संहताः पुनर्भेदेनोत्पद्यमानाव- तिष्ठमानभज्यमानाः क्रियावन्तश्च भवन्ति ।।१२९।।
लिंगेहिं जेहिं दव्वं जीवमजीवं च हवदि विण्णादं ।
संबन्धाभावादिति भावार्थः ।।१२९।। एवं जीवाजीवत्वलोकालोकत्वसक्रियनिःक्रियत्वकथनक्रमेण प्रथमस्थले गाथात्रयं गतम् । अथ ज्ञानादिविशेषगुणभेदेन द्रव्यभेदमावेदयति — लिंगेहिं जेहिं लिङ्गैर्यैः सहजशुद्धपरमचैतन्यविलासरूपैस्तथैवाचेतनैर्जडरूपैर्वा लिङ्गैश्चिह्नैर्विशेषगुणैर्यैः करणभूतैर्जीवेन कर्तृ- भूतेन हवदि विण्णादं विशेषेण ज्ञातं भवति । किं कर्मतापन्नम् । दव्वं द्रव्यम् । कथंभूतम् । जीवमजीवं च जीवद्रव्यमजीवद्रव्यं च । ते मुत्तामुत्ता गुणा णेया ते तानि पूर्वोक्तचेतनाचेतनलिङ्गानि मूर्तामूर्तगुणा ज्ञेया परिस्पन्दनस्वभाववाले होनेसे परिस्पंदके द्वारा नवीन कर्म – नोकर्मरूप पुद्गलोंसे भिन्न जीव उनके साथ एकत्रित होनेसे और १कर्म -नोकर्मरूप पुद्गलोंके साथ एकत्रित हुए जीव बादमें पृथक् होनेसे (इस अपेक्षासे) वे उत्पन्न होते हैं, टिकते हैं और नष्ट होते हैं ।।१२९।।
अब, यह बतलाते हैं कि – गुण विशेषसे (गुणोंके भेदसे) द्रव्य विशेष (द्रव्योंका भेद) होता है : —
अन्वयार्थ : — [यैः लिंगैः ] जिन लिंगोंसे [द्रव्यं ] द्रव्य [जीवः अजीवः च ] जीव और अजीवके रूपमें [विज्ञातं भवति ] ज्ञात होता है, [ते ] वे [अतद्भावविशिष्टाः ] अतद्भाव विशिष्ट (-द्रव्यसे अतद्भावके द्वारा भिन्न ऐसे) [मूर्तामूर्ताः ] मूर्त -अमूर्त [गुणाः ] गुण [ज्ञेयाः ] जानने चाहिये ।।१३०।।
ते जाण मूर्त -अमूर्त गुण, अतत्पणाथी विशिष्ट जे. १३०.
१. ज्ञानावरणादि कर्मरूप और शरीरादि नोकर्मरूप पुद्गलोंके साथ मिला हुआ जीव कंपनसे पुनः पृथक् हो जाता है । वहाँ (उन पुद्गलोंके साथ) एकत्ररूपसे वह नष्ट हुआ, जीवरूपसे स्थिर हुआ और (उनसे) पृथक्रूपसे उत्पन्न हुआ ।
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द्रव्यमाश्रित्य परानाश्रयत्वेन वर्तमानैलिंग्यते गम्यते द्रव्यमेतैरिति लिंगानि गुणाः । ते च यद्द्रव्यं भवति न तद् गुणा भवन्ति, ये गुणा भवन्ति ते न द्रव्यं भवतीति द्रव्यादतद्भावेन विशिष्टाः सन्तो लिंगलिंगिप्रसिद्धौ तलिंगत्वमुपढौकन्ते । अथ ते द्रव्यस्य जीवोऽयम- जीवोऽयमित्यादिविशेषमुत्पादयन्ति, स्वयमपि तद्भावविशिष्टत्वेनोपात्तविशेषत्वात् । यतो हि यस्य यस्य द्रव्यस्य यो यः स्वभावस्तस्य तस्य तेन तेन विशिष्टत्वात्तेषामस्ति विशेषः । अत एव च मूर्तानाममूर्तानां च द्रव्याणां मूर्तत्वेनामूर्तत्वेन च तद्भावेन विशिष्टत्वादिमे मूर्ता गुणा इमे अमूर्ता इति तेषां विशेषो निश्चेयः ।।१३०।।
अथ मूर्तामूर्तगुणानां लक्षणसंबन्धमाख्याति — ज्ञातव्याः । ते च कथंभूताः । अतब्भावविसिट्ठा अतद्भावविशिष्टाः । तद्यथा – शुद्धजीवद्रव्ये ये केवलज्ञानादिगुणास्तेषां शुद्धजीवप्रदेशैः सह यदेकत्वमभिन्नत्वं तन्मयत्वं स तद्भावो भण्यते, तेषामेव गुणानां तैः प्रदेशैः सह यदा संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदः क्रियते तदा पुनरतद्भावो भण्यते, तेनातद्भावेन संज्ञादिभेदरूपेण स्वकीयस्वकीयद्रव्येण सह विशिष्टा भिन्ना इति, द्वितीयव्याख्यानेन पुनः स्वकीय- द्रव्येण सह तद्भावेन तन्मयत्वेनान्यद्रव्याद्विशिष्टा भिन्ना इत्यभिप्रायः । एवं गुणभेदेन द्रव्यभेदो
टीका : — द्रव्यका आश्रय लेकर और परके आश्रयके बिना प्रवर्तमान होनेसे जिनके द्वारा द्रव्य ‘लिंगित’ (-प्राप्त) होता है – पहिचाना जा सकता है, ऐसे लिंग गुण हैं । वे (गुण), ‘जो द्रव्य हैं वे गुण नहीं हैं, जो गुण हैं वे द्रव्य नहीं हैं’ — इस अपेक्षासे द्रव्यसे १अतद्भावके द्वारा विशिष्ट (-भिन्न) वर्तते हुए, लिंग और २लिंगीके रूपमें प्रसिद्धि (ख्याति) के समय द्रव्यके लिंगत्वको प्राप्त होते हैं । अब, वे द्रव्यमें ‘यह जीव है, यह अजीव है’ ऐसा विशेष (-भेद) उत्पन्न करते हैं, क्योंकि स्वयं भी ३तद्भावके द्वारा ४विशिष्ट होनेसे विशेषको प्राप्त हैं । जिस -जिस द्रव्यका जो -जो स्वभाव हो उस -उसका उस -उसके द्वारा विशिष्टत्व होनेसे उनमें विशेष (-भेद) हैं; और इसीलिये मूर्त तथा अमूर्त द्रव्योंका मूर्तत्व -अमूर्तत्वरूप तद्भावके द्वारा विशिष्टत्व होनेसे उनमें इस प्रकारके भेद निश्चित करना चाहिये कि ‘यह मूर्त गुण हैं और यह अमूर्तगुण हैं’ ।।१३०।।
अब, मूर्त और अमूर्त गुणोंके लक्षण तथा संबंध (अर्थात् उनका किन द्रव्योंके साथ संबंध है यह) कहते हैं : —
१. अतद्भाव = (कथंचित्) उसरूप नहीं होना वह;
२. लिंगी = लिंगवाला, (विशेषगुण वह लिंग – चिह्न – लक्षण है और लिंगी वह द्रव्य है ) ।
३. तद्भाव = उसरूप, उसपना; उसपनेसे होना; स्वरूप ।
४. विशिष्ट = विशेषतावाला; खास; भिन्न ।
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मुत्ता इंदियगेज्झा पोग्गलदव्वप्पगा अणेगविधा ।
मूर्तानां गुणानामिन्द्रियग्राह्यत्वं लक्षणम् । अमूर्तानां तदेव विपर्यस्तम् । ते च मूर्ताः पुद्गलद्रव्यस्य, तस्यैवैकस्य मूर्तत्वात् । अमूर्ताः शेषद्रव्याणां, पुद्गलादन्येषां सर्वेषामप्य- मूर्तत्वात् ।।१३१।।
ज्ञातव्यः ।।१३०।। अथ मूर्तामूर्तगुणानां लक्षणं संबन्धं च निरूपयति — मुत्ता इंदियगेज्झा मूर्ता गुणा इन्द्रियग्राह्या भवन्ति, अमूर्ताः पुनरिन्द्रियविषया न भवन्ति इति मूर्तामूर्तगुणानामिन्द्रियानिन्द्रयविषयत्वं लक्षणमुक्तम् । इदानीं मूर्तगुणाः कस्य संबन्धिनो भवन्तीति संबन्धं कथयति । पोग्गलदव्वप्पगा अणेगविधा मूर्तगुणाः पुद्गलद्रव्यात्मका अनेकविधा भवन्ति; पुद्गलद्रव्यसंबन्धिनो भवन्तीत्यर्थः । अमूर्तगुणानां
अन्वयार्थ : — [इन्द्रियग्राह्याः मूर्ताः ] इन्द्रियग्राह्य ऐसे मूर्तगुण [पुद्गलद्रव्यात्मकाः ] पुद्गलद्रव्यात्मक [अनेक विधाः ] अनेक प्रकारके हैं; [अमूर्तानां द्रव्याणां ] अमूर्त द्रव्योंके [गुणाः ] गुण [अमूर्ताः ज्ञातव्याः ] अमूर्त जानना चाहिये ।।१३१।।
टीका : — मूर्त गुणोंका लक्षण इन्द्रियग्राह्यत्व है; और अमूर्तगुणोंका उससे विपरीत है; (अर्थात् अमूर्त गुण इन्द्रियोंसे ज्ञात नहीं होते ।) और मूर्त गुण पुद्गलद्रव्यके हैं, क्योंकि वही (पुद्गल ही) एक मूर्त है; और अमूर्त गुण शेष द्रव्योंके हैं, क्योंकि पुद्गलके अतिरिक्त शेष सभी द्रव्य अमूर्त हैं ।।१३१।।
अब, मूर्त पुद्गलद्रव्यके गुण कहते हैं : — गुण मूर्त इन्द्रियग्राह्य ते पुद्गलमयी बहुविध छे; द्रव्यो अमूर्तिक जेह तेना गुण अमूर्तिक जाणजे. १३१. छे वर्ण तेम ज गंध वळी रस -स्पर्श पुद्गलद्रव्यने,
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इन्द्रियग्राह्याः किल स्पर्शरसगन्धवर्णास्तद्विषयत्वात् । ते चेन्द्रियग्राह्यत्वव्यक्तिशक्ति- वशात् गृह्यमाणा अगृह्यमाणाश्च आ -एकद्रव्यात्मकसूक्ष्मपर्यायात्परमाणोः आ -अनेक- द्रव्यात्मकस्थूलपर्यायात्पृथिवीस्कन्धाच्च सकलस्यापि पुद्गलस्याविशेषेण विशेषगुणत्वेन विद्यन्ते । ते च मूर्तत्वादेव शेषद्रव्याणामसंभवन्तः पुद्गलमधिगमयन्ति । शब्दस्यापीन्द्रियग्राह्यत्वाद् गुणत्वं न खल्वाशंक नीयं, तस्य वैचित्र्यप्रपंचितवैश्वरूपस्याप्यनेकद्रव्यात्मकपुद्गलपर्यायत्वेनाभ्युप- संबन्धं प्रतिपादयति । दव्वाणममुत्ताणं विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावं यत्परमात्मद्रव्यं तत्प्रभृतीनाममूर्तद्रव्याणां संबन्धिनो भवन्ति । ते के । गुणा अमुत्ता अमूर्ताः गुणाः, केवलज्ञानादय इत्यर्थः । इति मूर्तामूर्तगुणानां लक्षणसंबन्धौ ज्ञातव्यौ ।।१३१।। एवं ज्ञानादिविशेषगुणभेदेन द्रव्यभेदो भवतीति कथनरूपेण द्वितीय- स्थले गाथाद्वयं गतम् । अथ मूर्तपुद्गलद्रव्यस्य गुणानावेदयति — वण्णरसगंधफासा विज्जंते पोग्गलस्स वर्णरसगन्धस्पर्शा विद्यन्ते । कस्य । पुद्गलस्य । कथंभूतस्य । सुहुमादो पुढवीपरियंतस्स य ‘‘पुढवी जलं च छाया चउरिंदियविसयकम्मपरमाणू । छव्विहभेयं भणियं पोग्गलदव्वं जिणवरेहिं’’ ।। इति
अन्वयार्थ : — [वर्णरसगंधस्पर्शाः ] वर्ण, रस, गंध और स्पर्श (-गुण) [सूक्ष्मात् ] सूक्ष्मसे लेकर [पृथ्वीपर्यंतस्य च ] पृथ्वी पर्यन्तके [पुद्गलस्य ] (सर्व) पुद्गलके [विद्यन्ते ] होते हैं; [चित्रः शब्दः ] जो विविध प्रकारका शब्द है [सः ] वह [पुद्गल ] पुद्गल अर्थात् पौद्गलिक पर्याय है ।।१३२।।
टीका : — स्पर्श, रस, गंध और वर्ण इन्द्रियग्राह्य हैं, क्योंकि वे इन्द्रियोंके विषय हैं । वे इन्द्रियग्राह्यताकी १व्यक्ति और शक्तिके वशसे भले ही इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये जाते हों या न किये जाते हों तथापि वे एकद्रव्यात्मक सूक्ष्मपर्यायरूप परमाणुसे लेकर अनेकद्रव्यात्मक स्थूलपर्यायरूप पृथ्वीस्कंध तकके समस्त पुद्गलके, अविशेषतया विशेष गुणोंके रूपमें होते हैं; और उनके मूर्त होनेके कारण ही, (पुद्गलके अतिरिक्त) शेष द्रव्योंके न होनेसे वे पुद्गलको बतलाते हैं ।
ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये कि शब्द भी इन्द्रियग्राह्य होनेसे गुण होगा; क्योंकि वह (शब्द) २विचित्रताके द्वारा विश्वरूपपना (अनेकानेकप्रकारपना) दरशाता होनेपर भी उसे अनेकद्रव्यात्मक पुद्गलपर्यायके रूपमें स्वीकार किया जाता है ।
१. परमाणु, कार्मणवर्गणा इत्यादिमें इन्द्रियग्राह्यता व्यक्त नहीं है तथापि शक्तिरूपसे अवश्य होती है; इसीलिये बहुतसे परमाणु स्कंधरूप होकर स्थूलता धारण करके इन्द्रियोंसे ज्ञात होते हैं ।
२. विचित्रता = विविधता (शब्द भाषात्मक, अभाषात्मक, प्रायोगिक, वैश्रसिक – ऐसे अनेक प्रकारके हैं ।)
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गम्यमानत्वात् । गुणत्वे वा, न तावदमूर्तद्रव्यगुणः शब्दः, गुणगुणिनोरविभक्तप्रदेशत्वेनैकवेदन- वेद्यत्वादमूर्तद्रव्यस्यापि श्रवणेन्द्रियविषयत्वापत्तेः । पर्यायलक्षणेनोत्खातगुणलक्षणत्वान्मूर्तद्रव्य- गुणोऽपि न भवति । पर्यायलक्षणं हि कादाचित्कत्वं, गुणलक्षणं तु नित्यत्वम् । ततः कादाचित्कत्वोत्खातनित्यत्वस्य न शब्दस्यास्ति गुणत्वम् । यत्तु तत्र नित्यत्वं तत्तदारम्भक- पुद्गलानां तद्गुणानां च स्पर्शादीनामेव, न शब्दपर्यायस्येति दृढतरं ग्राह्यम् । न च पुद्गल- गाथाकथितक्रमेण परमाणुलक्षणसूक्ष्मस्वरूपादेः पृथ्वीस्कन्धलक्षणस्थूलस्वरूपपर्यन्तस्य च । तथाहि — यथानन्तज्ञानादिचतुष्टयं विशेषलक्षणभूतं यथासंभवं सर्वजीवेषु साधारणं तथा वर्णादिचतुष्टयं विशेष- लक्षणभूतं यथासंभवं सर्वपुद्गलेषु साधारणम् । यथैव चानन्तज्ञानादिचतुष्टयं मुक्तजीवेऽतीन्द्रियज्ञान- विषयमनुमानगम्यमागमगम्यं च, तथा शुद्धपरमाणुद्रव्ये वर्णादिचतुष्टयमप्यतीन्द्रियज्ञानविषयमनुमान- गम्यमागमगम्यं च । यथा वानन्तचतुष्टयस्य संसारिजीवे रागादिस्नेहनिमित्तेन कर्मबन्धवशादशुद्धत्वं भवति तथा वर्णादिचतुष्टयस्यापि स्निग्धरूक्षगुणनिमित्तेन द्वि -अणुकादिबन्धावस्थायामशुद्धत्वम् । यथा वानन्तज्ञानादिचतुष्टयस्य रागादिस्नेहरहितशुद्धात्मध्यानेन शुद्धत्वं भवति तथा वर्णादिचतुष्टयस्यापि स्निग्धगुणाभावे बन्धनेऽसति परमाणुपुद्गलावस्थायां शुद्धत्वमिति । सद्दो सो पोग्गलो यस्तु शब्दः स
यदि शब्दको (पर्याय न मानकर) गुण माना जाय तो वह क्यों योग्य नहीं है उसका समाधान : —
प्रथम तो, शब्द अमूर्त द्रव्यका गुण नहीं है क्योंकि गुण -गुणीमें अभिन्न प्रदेशपना होनेसे वे (गुण -गुणी) १एक वेदनसे वेद्य होनेसे अमूर्त द्रव्यको भी श्रवणेन्द्रियका विषयभूतपना आ जायगा ।
(दूसरे, शब्दमें) पर्यायके लक्षणद्वारा गुणका लक्षण उत्थापित होनेसे शब्द मूर्त द्रव्यका गुण भी नहीं है । पर्यायका लक्षण कादाचित्कपना (अनित्यपना) है, और गुणका लक्षण नित्यपना है; इसलिये (शब्दमें) अनित्यपनेसे नित्यपनेके उत्थापित होनेसे (अर्थात् शब्द कभी- कभी ही होता है, और नित्य नहीं है, इसलिये) शब्द वह गुण नहीं है । जो वहाँ नित्यपना है वह उसे (शब्दको) उत्पन्न करनेवाले पुद्गलोंका और उनके स्पर्शादिक गुणोंका ही है, शब्दपर्यायका नहीं — इसप्रकार अति दृढ़तापूर्वक ग्रहण करना चाहिये ।
१. एक वेदनसे वेद्य = एक ज्ञानसे ज्ञात होने योग्य (नैयायिक शब्दको आकाशका गुण मानते हैं किन्तु यह मान्यता अप्रमाण है । गुण -गुणीके प्रदेश अभिन्न होते हैं, इसलिये जिस इन्द्रियसे गुण ज्ञात होता है उसीसे गुणी -भी ज्ञात होना चाहिए । शब्द कर्णेन्द्रियसे जाना जाता है, इसलिये आकाश भी कर्णेन्द्रियसे ज्ञात होना चाहिये । किन्तु वह तो किसी भी इन्द्रियसे ज्ञात होता नहीं है । इसलिये शब्द आकाशादि अमूर्तिक द्रव्योंका गुण नहीं है ।)
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पर्यायत्वे शब्दस्य पृथिवीस्कन्धस्येव स्पर्शनादीन्द्रियविषयत्वम्; अपां घ्राणेन्द्रियाविषयत्वात्, ज्योतिषो घ्राणरसनेन्द्रियाविषयत्वात्, मरुतो घ्राणरसनचक्षुरिन्द्रियाविषयत्वाच्च । न चागन्धा- गन्धरसागन्धरसवर्णाः एवमप्ज्योतिर्मारुतः, सर्वपुद्गलानां स्पर्शादिचतुष्कोपेतत्वाभ्युपगमात्; व्यक्तस्पर्शादिचतुष्कानां च चन्द्रकान्तारणियवानामारम्भकैरेव पुद्गलैरव्यक्तगन्धाव्यक्तगन्धरसा- व्यक्तगन्धरसवर्णानामप्ज्योतिरुदरमरुतामारम्भदर्शनात् । न च क्वचित्कस्यचित् गुणस्य व्यक्ता- पौद्गलः । यथा जीवस्य नरनारकादिविभावपर्यायाः तथायं शब्दः पुद्गलस्य विभावपर्यायो, न च गुणः । कस्मात् । गुणस्याविनश्वरत्वात्, अयं च विनश्वरो । नैयायिकमतानुसारी कश्चिद्वदत्याकाश- गुणोऽयं शब्दः । परिहारमाह – आकाशगुणत्वे सत्यमूर्तो भवति । अमूर्तश्च श्रवणेन्द्रियविषयो न भवति, दृश्यते च श्रवणेन्द्रियविषयत्वम् । शेषेन्द्रियविषयः कस्मान्न भवतीति चेत् —
और ‘‘यदि शब्द पुद्गलकी पर्याय हो तो वह पृथ्वीस्कंधकी भाँति स्पर्शनादिक इद्रियोंका विषय होना चाहिये, अर्थात् जैसे पृथ्वीस्कंधरूप पुद्गलपर्याय सर्व इन्द्रियोंसे ज्ञात होती है उसीप्रकार शब्दरूप पुद्गलपर्याय भी सभी इन्द्रियोंसे ज्ञात होनी चाहिये’’ (ऐसा तर्क किया जाय तो) ऐसा भी नहीं है; क्योंकि पानी (पुद्गलकी पर्याय होने पर भी) घ्राणेन्द्रियका विषय नहीं है; अग्नि (पुद्गलकी पर्याय होने पर भी) घ्राणेन्द्रिय तथा रसनेन्द्रियका विषय नहीं है और वायु (पुद्गलकी पर्याय होने परभी) घ्राण, रसना तथा चक्षुइन्द्रियका विषय नहीं है । और ऐसा भी नहीं है कि पानी गंध रहित है (इसलिये नाकसे अग्राह्य है ), अग्नि गंध तथा रस रहित है (इसलिये नाक, जीभसे अग्राह्य है ) और वायु गंध, रस तथा वर्ण रहित है (इसलिये नाक, जीभ तथा आँखोंसे अग्राह्य है ); क्योंकि सभी पुद्गल स्पर्शादि १चतुष्कयुक्त स्वीकार किये गये हैं क्योंकि जिनके स्पर्शादि चतुष्क व्यक्त हैं ऐसे (१) चन्द्रकांतमणिको, (२) अरणिको और (३) जौ को जो पुद्गल उत्पन्न करते हैं उन्हीं के द्वारा (१) जिसकी गंध अव्यक्त है ऐसे पानीकी, (२) जिसकी गंध तथा रस अव्यक्त है ऐसी अग्निकी और (३) जिसकी गंध, रस तथा वर्ण अव्यक्त है ऐसी उदरवायुकी उत्पत्ति होती देखी जाती है ।
१. चतुष्क = चतुष्टय, चारका समूह । [समस्त पुद्गलोंमें — पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु इन सबहीमें —
स्पर्शादि चारों गुण होते हैं । मात्र अन्तर इतना ही हैं कि पृथ्वीमें चारों गुण व्यक्त हैं, पानीमें गंध अव्यक्त
है, अग्निमें गंध तथा रस अव्यक्त है, और वायुमें गंध, रस, तथा वर्ण अव्यक्त हैं । इस बातकी सिद्धिके
लिये युक्ति इसप्रकार है : – चन्द्रकान्तमणिरूप पृथ्वीमेंसे पानी झरता है; अरणिकी -लकड़ीमेंसे अग्नि प्रगट
होती है और जौ खानेसे पेटमें वायु उत्पन्न होती है; इसलिये (१) चन्द्रकांतमणिमें, (२) अरणि -लकड़ीमें
और (३) जौ में रहनेवाले चारों गुण (१) पानीमें, (२) अग्निमें और (३) वायुमें होने चाहिये । मात्र
अन्तर इतना ही है कि उन गुणोंमेंसे कुछ अप्रगटरूपसे परिणमित हुये हैं । और फि र, पानीमेंसे मोतीरूप
पृथ्वीकाय अथवा अग्निमेंसे काजलरूप पृथ्वीकायके उत्पन्न होने पर चारों गुण प्रगट होते हुये देखे जाते
हैं । ]
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व्यक्तत्वं कादाचित्कपरिणामवैचित्र्यप्रत्ययं नित्यद्रव्यस्वभावप्रतिघाताय । ततोऽस्तु शब्दः पुद्गलपर्याय एवेति ।।१३२।। अथामूर्तानां शेषद्रव्याणां गुणान् गृणाति — आगासस्सवगाहो धम्मद्दव्वस्स गमणहेदुत्तं । धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणो ठाणकारणदा ।।१३३।। कालस्स वट्टणा से गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो ।
णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं ।।१३४।। जुगलं । अन्येन्द्रियविषयोऽन्येन्द्रियस्य न भवति वस्तुस्वभावादेव, रसादिविषयवत् । पुनरपि कतंभूतः । चित्तो चित्रः भाषात्मकाभाषात्मकरूपेण प्रायोगिकवैश्रसिकरूपेण च नानाप्रकारः । तच्च ‘‘सद्दो खंधप्पभवो’’ इत्यादिगाथायां पञ्चास्तिकाये व्याख्यातं तिष्ठत्यत्रालं प्रसङ्गेन ।।१३२।। अथाकाशाद्यमूर्तद्रव्याणां विशेषगुणान्प्रतिपादयति — आगासस्सवगाहो आकाशस्यावगाहहेतुत्वं, धम्मद्दव्वस्स गमणहेदुत्तं धर्मद्रव्यस्य गमनहेतुत्वं, धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणो ठाणकारणदा धर्मेतरद्रव्यस्य तु पुनः स्थानकारणतागुणो भवतीति प्रथमगाथा गता । कालस्स वट्टणा से कालस्य वर्तना स्याद्गुणः, गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो ज्ञानदर्शनोपयोगद्वयमित्यात्मनो गुणो भणितः । णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं एवं संक्षेपादमूर्तद्रव्याणां गुणा ज्ञेया इति । तथाहि — सर्वद्रव्याणां साधारणमवगाहहेतुत्वं
और कहीं (किसी पर्यायमें) किसी गुणकी कादाचित्क परिणामकी विचित्रताके कारण होनेवाला व्यक्तपना या अव्यक्तपना नित्य द्रव्यस्वभावका प्रतिघात नहीं करता । (अर्थात् अनित्यपरिणामके कारण होनेवाली गुणकी प्रगटता और अप्रगटता नित्य द्रव्यस्वभावके साथ कहीं विरोधको प्राप्त नहीं होती ।)
इसलिये शब्द पुद्गलकी पर्याय ही हो ।।१३२।।
अब, शेष अमूर्त द्रव्योंके गुण कहते हैं : —
अवगाह गुण आकाशनो, गतिहेतुता छे धर्मनो, वळी स्थानकारणतारूपी गुण जाण द्रव्य अधर्मनो. १३३. छे काळनो गुण वर्तना उपयोग भाख्यो जीवमां, ए रीत मूर्तिविहीनना गुण जाणवा संक्षेपमां. १३४.
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आकाशस्यावगाहो धर्मद्रव्यस्य गमनहेतुत्वम् ।
धर्मेतरद्रव्यस्य तु गुणः पुनः स्थानकारणता ।।१३३।।
कालस्य वर्तना स्यात् गुण उपयोग इति आत्मनो भणितः ।
ज्ञेयाः संक्षेपाद्गुणा हि मूर्तिप्रहीणानाम् ।।१३४।। युगलम् ।
विशेषगुणो हि युगपत्सर्वद्रव्याणां साधारणावगाहहेतुत्वमाकाशस्य, सकृत्सर्वेषां गमनपरिणामिनां जीवपुद्गलानां गमनहेतुत्वं धर्मस्य, सकृत्सर्वेषां स्थानपरिणामिनां जीवपुद्गलानां स्थानहेतुत्वमधर्मस्य, अशेषशेषद्रव्याणां प्रतिपर्यायं समयवृत्तिहेतुत्वं कालस्य, चैतन्यपरिणामो जीवस्य । एवममूर्तानां विशेषगुणसंक्षेपाधिगमे लिंगम् । तत्रैककालमेव विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सदाकाशं निश्चिनोति । गतिपरिणतसमस्तजीवपुद्गलानामेकसमये साधारणं गमनहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सद्धर्मद्रव्यं निश्चिनोति । तथैव च स्थिति- परिणतसमस्तजीवपुद्गलानामेकसमये साधारणं स्थितिहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्सद- धर्मद्रव्यं निश्चिनोति । सर्वद्रव्याणां युगपत्पर्यायपरिणतिहेतुत्वं विशेषगुणत्वादेवान्यद्रव्याणामसंभवत्स- त्कालद्रव्यं निश्चिनोति । सर्वजीवसाधारणं सकलविमलकेवलज्ञानदर्शनद्वयं विशेषगुणत्वादेवान्या- चेतनपञ्चद्रव्याणामसंभवत्सच्छुद्धबुद्धैकस्वभावं परमात्मद्रव्यं निश्चिनोति । अयमत्रार्थः — यद्यपि पञ्च- द्रव्याणि जीवस्योपकारं कुर्वन्ति तथापि तानि दुःखकारणान्येवेति ज्ञात्वाक्षयानन्तसुखादिकारणं
अन्वयार्थ : — [आकाशस्यावगाहः ] आकाशका अवगाह, [धर्मद्रव्यस्य गमनहेतुत्वं ] धर्मद्रव्यका गमनहेतुत्व [तु पुनः ] और [धर्मेतरद्रव्यस्य गुणः ] अधर्म द्रव्यका गुण [स्थानकारणता ] स्थानकारणता है । [कालस्य ] कालका गुण [वर्तता स्यात् ] वर्तना है, [आत्मनः गुणः ] आत्माका गुण [उपयोगः इति भणितः ] उपयोग कहा है । [मूर्तिप्रहीणानां गुणाः हि ] इसप्रकार अमूर्त द्रव्योंके गुण [संक्षेपात् ] संक्षेपसे [ज्ञेयाः ] जानना चाहिये ।।१३३ -१३४।।
टीका : — युगपत् सर्वद्रव्योंके साधारण अवगाहका हेतुपना आकाशका विशेष गुण है । एक ही साथ सर्व गमनपरिणामी (गतिरूप परिणमित) जीव -पुद्गलोंके गमनका हेतुपना धर्मका विशेष गुण है । एक ही साथ सर्व स्थानपरिणामी (स्थितिरूप परिणमित) जीव- पुद्गलोंके स्थिर होनेका हेतुत्व स्थितिका अर्थात् स्थिर होनेका निमित्तपना अधर्मका विशेषगुण है । (कालके अतिरिक्त) शेष समस्त द्रव्योंकी प्रति -पर्यायमें समयवृत्तिका हेतुपना (समय- समयकी परिणतिका निमित्तत्व) कालका विशेष गुण है । चैतन्यपरिणाम जीवका विशेष गुण है । इसप्रकार अमूर्त द्रव्योंके विशेष गुणोंका संक्षिप्त ज्ञान होने पर अमूर्त द्रव्योंको जाननेके लिंग (चिह्न, लक्षण, साधन) प्राप्त होते हैं; अर्थात् उन -उन विशेष गुणोंके द्वारा उन -उन अमूर्त
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सकलद्रव्यसाधारणावगाहसंपादनमसर्वगतत्वादेव शेषद्रव्याणामसंभवदाकाशमधिगमयति । तथैक- वारमेव गतिपरिणतसमस्तजीवपुद्गलानामालोकाद्गमनहेतुत्वमप्रदेशत्वात्कालपुद्गलयोः, समुद्घा- तादन्यत्र लोकासंख्येयभागमात्रत्वाज्जीवस्य, लोकालोक सीम्नोऽचलितत्वादाकाशस्य, विरुद्ध- कार्यहेतुत्वादधर्मस्यासंभवद्धर्ममधिगमयति । तथैकवारमेव स्थितिपरिणतसमस्तजीवपुद्गला- नामालोकात्स्थानहेतुत्वमप्रदेशत्वात्कालपुद्गलयोः, समुद्घातादन्यत्र लोकासंख्येयभागमात्रत्वा- ज्जीवस्य, लोकालोकसीम्नोऽचलितत्वादाकाशस्य, विरुद्धकार्यहेतुत्वाद्धर्मस्य चासंभवदधर्ममधि- विशुद्धज्ञानदर्शनोपयोगस्वभावं परमात्मद्रव्यं तदेव मनसा ध्येयं वचसा वक्तव्यं कायेन तत्साधक- मनुष्ठानं च कर्तव्यमिति ।।१३३ । १३४।। एवं कस्य द्रव्यस्य के विशेषगुणा भवन्तीति कथनरूपेण द्रव्योंका अस्तित्व ज्ञात होता है — सिद्ध होता है । (इसीको स्पष्टतापूर्वक समझाते हैं : — )
वहाँ एक ही कालमें समस्त द्रव्योंको साधारण १अवगाहका संपादन (-अवगाहहेतुपनेरूप लिंग) आकाशको बतलाता है; क्योंकि शेष द्रव्योंके सर्वगत (सर्वव्यापक) न होनेसे उनके वह संभव नहीं है ।
इसीप्रकार एक ही कालमें गतिपरिणत (गतिरूपसे परिणमित हुए) समस्त जीव- पुद्गलोंको लोक तक गमनका हेतुपना धर्मको बतलाता है; क्योंकि काल और पुद्गल अप्रदेशी हैं इसलिये उनके वह संभव नहीं है; जीव समुद्घातको छोड़कर अन्यत्र लोकके असंख्यातवें भाग मात्र है, इसलिये उसके वह संभव नहीं है, लोक -अलोककी सीमा अचलित होनेसे आकाशको वह संभव नहीं है और विरुद्ध कार्यका हेतु होनेसे अधर्मको वह संभव नहीं है । (काल और पुद्गल एकप्रदेशी हैं, इसलिये वे लोक तक गमनमें निमित्त नहीं हो सकते; जीव समुद्घातको छोड़कर अन्य कालमें लोकके असंख्यातवें भागमें ही रहता है, इसलिये वह भी लोक तक गमनमें निमित्त नहीं हो सकता; यदि आकाश गतिमें निमित्त हो तो जीव और पुद्गलोंकी गति अलोकमें भी होने लगे, जिससे लोकाकाशकी मर्यादा ही न रहेगी; इसलिये गतिहेतुत्व आकाशका भी गुण नहीं है; अधर्म द्रव्य तो गतिसे विरुद्ध स्थितिकार्यमें निमित्तभूत है, इसलिये वह भी गतिमें निमित्त नहीं हो सकता । इसप्रकार गतिहेतुत्वगुण धर्मनामक द्रव्यका अस्तित्व बतलाता है ।)
इसीप्रकार एक ही कालमें स्थितिपरिणत समस्त जीव -पुद्गलोंको लोक तक स्थितिका हेतुपना अधर्मको बतलाता है; क्योंकि काल और पुद्गल अप्रदेशी होनेसे उनके वह संभव नहीं है; जीव समुद्घातको छोड़कर अन्यत्र लोकके असंख्यातवें भाग मात्र है, इसलिये उसके वह संभव नहीं है; लोक और अलोककी सीमा अचलित होनेसे आकाशके वह संभव नहीं है, और प्र ३४
१. अवगाह = लीन होना; मज्जित होना, अवकाश प्राप्त करना । (एक ही कालमें सर्व द्रव्योंको सामान्य अवकाशकी प्राप्तिमें आकाशद्रव्य निमित्तभूत है ।)
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गमयति । तथा अशेषशेषद्रव्याणां प्रतिपर्यायं समयवृत्तिहेतुत्वं कारणान्तरसाध्यत्वात्समय- विशिष्टाया वृत्तेः स्वतस्तेषामसंभवत्कालमधिगमयति । तथा चैतन्यपरिणामोऽचेतनत्वादेव शेष- द्रव्याणामसंभवन् जीवमधिगमयति । एवं गुणविशेषाद् द्रव्यविशेषोऽधिगन्तव्यः ।।१३३ । १३४।।
अथ द्रव्याणां प्रदेशवत्त्वाप्रदेशवत्त्वविशेषं प्रज्ञापयति — तृतीयस्थले गाथात्रयं गतम् । अथ कालद्रव्यं विहाय जीवादिपञ्चद्रव्याणामस्तिकायत्वं व्याख्याति — विरुद्ध कार्यका हेतु होनेसे धर्मको वह संभव नहीं है ।
इसीप्रकार (कालके अतिरिक्त) शेष समस्त द्रव्योंके प्रत्येक पर्यायमें समयवृत्तिका हेतुपना कालको बतलाता है, क्योंकि उनके १समयविशिष्ट वृत्ति कारणान्तरसे सधती होनेसे (अर्थात् उनके समयसे विशिष्ट ऐसी परिणति अन्य कारणसे होती है,) इसलिये स्वतः उनके वह (समयवृत्तिहेतुपना) संभवित नहीं है ।
इसीप्रकार चैतन्यपरिणाम जीवको बतलाता है, क्योंकि वह चेतन होनेसे शेष द्रव्योंके संभव नहीं है ।
इसप्रकार गुणविशेषसे द्रव्यविशेष जानना चाहिये ।
भावार्थ : — जैसा कि पहले बताया गया है, – स्पर्श, रस, गंध, वर्णसे पुद्गल द्रव्योंका अस्तित्व ज्ञात होता है । यहाँ अमूर्त द्रव्योंका अस्तित्व उनके विशेष लक्षणोंसे प्रगट किया गया है ।
चैतन्यपरिणामरूप लक्षण अनुभवमें आता है इसलिये अनन्त जीवद्रव्योंका अस्तित्व ज्ञात होता है । जीवादि समस्त द्रव्य जिसके निमित्तसे अवगाह (अवकाश) को प्राप्त करते हैं ऐसा कोई द्रव्य होना चाहिये; वह द्रव्य लोकालोकव्यापी आकाश है । जीव और पुद्गल गति करते हुए मालूम होते हैं, इसलिये जैसे मछलीको गति करनेमें निमित्तभूत जल है उसी प्रकार जीव और पुद्गलोंको गति करनेमें निमित्तभूत कोई द्रव्य होना चाहिये; वह द्रव्य लोकव्यापी धर्मद्रव्य है । जैसे मनुष्यको स्थितिमें निमित्तभूत पृथ्वी है उसीप्रकार जीव और पुद्गलोंकी स्थितिमें निमित्तभूत कोई द्रव्य होना चाहिये । वह द्रव्य लोकव्यापी अधर्मद्रव्य है । जैसे कुम्हारके चक्रके चलनेमें कील निमित्तभूत है उसीप्रकार (कालके अतिरिक्त) सर्व द्रव्योंके परिणमनमें निमित्तभूत कोई द्रव्य होना चाहिये; वह द्रव्य असंख्यात कालाणु हैं, जिनकी पर्यायें समय, घड़ी, दिन, वर्ष इत्यादिरूपसे व्यक्त होती हैं ।
इसप्रकार गुणभेदसे द्रव्यभेद निश्चित हुआ ।।१३३ -१३४।।
अब, द्रव्यका २प्रदेशवत्व और अप्रदेशवत्वरूप विशेष (-भेद) बतलाते हैं : —
१. कालके अतिरिक्त द्रव्योंकी परिणति ‘एक समयमें यह परिणति हुई है’ इसप्रकार समयसे विशिष्ट है अर्थात् व्यवहारसे उसमें समयकी अपेक्षा आती है, इसलिये उसमें कोई द्रव्य — कालद्रव्य — निमित्त होना चाहिये ।
२. प्रदेशवत्व = प्रदेशवानपना ।
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प्रदेशवन्ति हि जीवपुद्गलधर्माधर्माकाशानि अनेकप्रदेशवत्त्वात् । अप्रदेशः कालाणुः प्रदेशमात्रत्वात् । अस्ति च संवर्तविस्तारयोरपि लोकाकाशतुल्यासंख्येयप्रदेशापरित्यागाज्जीवस्य, द्रव्येण प्रदेशमात्रत्वादप्रदेशत्वेऽपि द्विप्रदेशादिसंख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशपर्यायेणानवधारित- प्रदेशत्वात्पुद्गलस्य, सकललोकव्याप्यसंख्येयप्रदेशप्रस्ताररूपत्वाद् धर्मस्य, सकललोकव्याप्य- जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा पुणो य आगासं जीवाः पुद्गलकायाः धर्माधर्मौ पुनश्चाकाशम् । एते पञ्चास्तिकायाः किंविशिष्टाः । सपदेसेहिं असंखा स्वप्रदेशैरसंख्येयाः । अत्रासंख्येयप्रदेशशब्देन प्रदेशबहुत्वं ग्राह्यम् । तच्च यथासंभवं योजनीयम् । जीवस्य तावत्संसारावस्थायां विस्तारोपसंहारयोरपि प्रदीप- वत्प्रदेशानां हानिवृद्धयोरभावाद्वयवहारेण देहमात्रेऽपि निश्चयेन लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेशत्वम् ।
अन्वयार्थ : — [जीवाः ] जीव [पुद्गलकायाः ] पुद्गलकाय, [धर्माधर्मौ ] धर्म, अधर्म [पुनः च ] और [आकाशं ] आकाश [स्वप्रदेशैः ] स्वप्रदेशोंकी अपेक्षासे [असंख्याताः ] असंख्यात अर्थात् अनेक हैं; [कालस्य ] कालके [प्रदेशाः इति ] प्रदेश [न सन्ति ] नहीं हैं ।।१३५।।
टीका : — जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश अनेक प्रदेशवाले होनेसे प्रदेशवान् हैं । कालाणु प्रदेशमात्र (एकप्रदेशी) होनेसे अप्रदेशी है ।
[उपरोक्त बातको स्पष्ट करते हैं : — ] संकोच -विस्तारके होने पर भी जीव लोकाकाश तुल्य असंख्य प्रदेशोंको नहीं छोड़ता, इसलिये वह प्रदेशवान् है; पुद्गल यद्यपि द्रव्य अपेक्षासे प्रदेशमात्र (-एकप्रदेशी) होनेसे अप्रदेशी है तथापि, दो प्रदेशोंसे लेकर संख्यात, असंख्यात, और अनन्तप्रदेशोंवाली पर्यायोंकी अपेक्षासे अनिश्चित प्रदेशवाला होनेसे प्रदेशवान् है; सकल लोकव्यापी असंख्य प्रदेशोंके १प्रस्ताररूप होनेसे धर्म प्रदेशवान है; सकललोकव्यापी असंख्य
जीवद्रव्य, पुद्गलकाय, धर्म, अधर्म वळी आकाशने छे स्वप्रदेश अनेक, नहि वर्ते प्रदेशो काळने. १३५.
१. प्रस्तार = फै लाव; विस्तार ।