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भूतरूपिद्रव्याणि च परस्परप्रवेशमन्तरेणापि ज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणान्येवमात्माऽर्थाश्चा- न्योन्यवृत्तिमन्तरेणापि विश्वज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणाः ।।२८।। अथार्थेष्ववृत्तस्यापि ज्ञानिनस्तद्वृत्तिसाधकं शक्तिवैचित्र्यमुद्योतयति — ण पविट्ठो णाविट्ठो णाणी णेयेसु रूवमिव चक्खू ।
जाणदि पस्सदि णियदं अक्खातीदो जगमसेसं ।।२९।। तथाहि ---यथा रूपिद्रव्याणि चक्षुषा सह परस्परं संबन्धाभावेऽपि स्वाकारसमर्पणे समर्थानि, चक्षूंषि च तदाकारग्रहणे समर्थानि भवन्ति, तथा त्रैलोक्योदरविवरवर्तिपदार्थाः कालत्रयपर्यायपरिणता ज्ञानेन सह परस्परप्रदेशसंसर्गाभावेऽपि स्वकीयाकारसमर्पणे समर्था भवन्ति, अखण्डैकप्रतिभासमयं केवलज्ञानं तु तदाकारग्रहणे समर्थमिति भावार्थः ।।२८।। अथ ज्ञानी ज्ञेयपदार्थेषु निश्चयनयेनाप्रविष्टोऽपि व्यवहारेण प्रविष्ट इव प्रतिभातीति शक्तिवैचित्र्यं दर्शयति ---ण पविट्ठो निश्चयनयेन न प्रविष्टः, णाविट्ठो व्यवहारेण च नाप्रविष्टः किंतु प्रविष्ट एव । स कः कर्ता । णाणी ज्ञानी । केषु मध्ये । णेयेसु ज्ञेयपदार्थेषु । किमिव । रूवमिव चक्खू रूपविषये चक्षुरिव । एवंभूतस्सन् किं करोति । जाणदि पस्सदि जानाति पश्यति च । णियदं निश्चितं संशयरहितं । किंविशिष्टः सन् । अक्खातीदो अक्षातीतः । किं जानाति पश्यति । जगमसेसं और रूपी पदार्थोंकी भाँति उपचारसे कहा जा सकता है) । जैसे नैत्र और उनके विषयभूत रूपी पदार्थ परस्पर प्रवेश किये बिना ही ज्ञेयाकारों को ग्रहण और समर्पण करनेके स्वभाववाले हैं, उसी प्रकार आत्मा और पदार्थ एक दूसरेमें प्रविष्ट हुए बिना ही समस्त ज्ञेयाकारोंके ग्रहण और समर्पण करनेके स्वभाववाले हैं । (जिस प्रकार आँख रूपी पदार्थोंमें प्रवेश नहीं करती और रूपी पदार्थ आँखमें प्रवेश नहीं करते तो भी आँख रूपी पदार्थोंके ज्ञेयाकारोंके ग्रहण करने — जाननेके — स्वभाववाली है और रूपी पदार्थ स्वयंके ज्ञेयाकारोंको समर्पित होने — जनानेके — स्वभाववाले हैं, उसीप्रकार आत्मा पदार्थोंमें प्रवेश नहीं करता और पदार्थ आत्मामें प्रवेश नहीं करते तथापि आत्मा पदार्थोंके समस्त ज्ञेयाकारोंको ग्रहण कर लेने — जानलेनेके स्वभाववाला है और पदार्थ स्वयंके समस्त ज्ञेयाकारोंको समर्पित हो जाने — ज्ञात हो जानेके स्वभाववाले हैं ।) ।।२८।।
अब, आत्मा पदार्थोंमें प्रवृत्त नहीं होता तथापि जिससे (जिस शक्तिवैचित्र्यसे ) उसका पदार्थोंमें प्रवृत्त होना सिद्ध होता है उस शक्तिवैचित्र्यको उद्योत करते हैं : —
ज्ञेये प्रविष्ट न, अणप्रविष्ट न, जाणतो जग सर्वने नित्ये अतीन्द्रिय आतमा, ज्यम नेत्र जाणे रूपने.२९.
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यथा हि चक्षू रूपिद्रव्याणि स्वप्रदेशैरसंस्पृशदप्रविष्टं परिच्छेद्यमाकारमात्मसात्कुर्वन्न चाप्रविष्टं जानाति पश्यति च, एवमात्माप्यक्षातीतत्वात्प्राप्यकारिताविचारगोचरदूरतामवाप्तो ज्ञेयतामापन्नानि समस्तवस्तूनि स्वप्रदेशैरसंस्पृशन्न प्रविष्टः शक्तिवैचित्र्यवशतो वस्तुवर्तिनः समस्तज्ञेयाकारानुन्मूल्य इव क वलयन्न चाप्रविष्टो जानाति पश्यति च । एवमस्य विचित्रशक्ति योगिनो ज्ञानिनोऽर्थेष्वप्रवेश इव प्रवेशोऽपि सिद्धिमवतरति ।।२९।। जगदशेषमिति । तथा हि ---यथा लोचनं कर्तृ रूपिद्रव्याणि यद्यपि निश्चयेन न स्पृशति तथापि व्यवहारेण स्पृशतीति प्रतिभाति लोके । तथायमात्मा मिथ्यात्वरागाद्यास्रवाणामात्मनश्च संबन्धि यत्केवलज्ञानात्पूर्वं विशिष्टभेदज्ञानं तेनोत्पन्नं यत्केवलज्ञानदर्शनद्वयं तेन जगत्त्रयकालत्रयवर्तिपदार्थान्निश्चयेनास्पृशन्नपि व्यवहारेण स्पृशति, तथा स्पृशन्निव ज्ञानेन जानाति दर्शनेन पश्यति च । कथंभूतस्सन् । अतीन्द्रियसुखास्वादपरिणतः सन्नक्षातीत इति । ततो ज्ञायते निश्चयेनाप्रवेश इव व्यवहारेण ज्ञेयपदार्थेषु
अन्वयार्थ : — [चक्षुः रूपं इव ] जैसे चक्षु रूपको (ज्ञेयोंमें अप्रविष्ट रहकर तथा अप्रविष्ट न रहकर जानती -देखती है) उसीप्रकार [ज्ञानी ] आत्मा [अक्षातीतः ] इन्द्रियातीत होता हुआ [अशेषं जगत् ] अशेष जगतको (-समस्त लोकालोकको) [ज्ञेयेषु ] ज्ञेयोमां [न प्रविष्टः ] अप्रविष्ट रहकर [न अविष्टः ] तथा अप्रविष्ट न रहकर [नियतं ] निरन्तर [जानाति पश्यति ] जानता -देखता है ।।२९।।
टीका : — जिसप्रकार चक्षु रूपी द्रव्योंको स्वप्रदेशोंके द्वारा अस्पर्श करता हुआ अप्रविष्ट रहकर (जानता -देखता है) तथा ज्ञेय आकारोंको आत्मसात् (-निजरूप) करता हुआ अप्रविष्ट न रहकर जानता -देखता है; इसीप्रकार आत्मा भी इन्द्रियातीतताके कारण करता है, इसलिये अप्रविष्ट रहकर (जानता -देखता है) तथा शक्ति वैचित्र्यके कारण वस्तुमें वर्तते समस्त ज्ञेयाकारोंको मानों मूलमेंसे उखाड़कर ग्रास कर लेनेसे अप्रविष्ट न रहकर जानता- देखता है । इसप्रकार इस विचित्र शक्तिवाले आत्माके पदार्थोंमें अप्रवेशकी भाँति प्रवेश भी सिद्ध होता है ।
भावार्थ : — यद्यपि आँख अपने प्रदेशोंसे रूपी पदार्थोंको स्पर्श नहीं करती इसलिये वह निश्चयसे ज्ञेयोंमें अप्रविष्ट है तथापि वह रूपी पदार्थोंको जानती -देखती है, इसलिये व्यवहारसे
आत्मामें प्राप्यकारिताके विचारका भी अवकाश नहीं है) । પ્ર. ૭
१प्राप्यकारिताकी विचारगोचरतासे दूर होता हुआ ज्ञेयभूत समस्त वस्तुओंको स्वप्रदेशोंसे अस्पर्श
१. प्राप्यकारिता = ज्ञेय विषयोंको स्पर्श करके ही कार्य कर सकना — जान सकना । (इन्द्रियातीत हुए
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यथा किलेन्द्रनीलरत्नं दुग्धमधिवसत्स्वप्रभाभारेण तदभिभूय वर्तमानं दृष्टं, तथा प्रवेशोऽपि घटत इति ।।२९।। अथ तमेवार्थं दृष्टान्तद्वारेण दृढयति --रयणं रत्नं इह जगति । किंनाम । इंदणीलं इन्द्रनीलसंज्ञम् । किंविशिष्टम् । दुद्धज्झसियं दुग्धे निक्षिप्तं जहा यथा सभासाए स्वकीयप्रभया अभिभूय तिरस्कृत्य । किम् । तं पि दुद्धं तत्पूर्वोक्तं दुग्धमपि वट्टदि वर्तते । इति दृष्टान्तो गतः । तह णाणमट्ठेसु तथा ज्ञानमर्थेषु वर्तत इति । तद्यथा ---यथेन्द्रनीलरत्नं कर्तृ स्वकीयनीलप्रभया करणभूतया दुग्धं नीलं कृत्वा वर्तते, तथा निश्चयरत्नत्रयात्मकपरमसामायिक- संयमेन यदुत्पन्नं केवलज्ञानं तत् स्वपरपरिच्छित्तिसामर्थ्येन समस्ताज्ञानान्धकारं तिरस्कृत्य यह कहा जाता है कि ‘मेरी आँख बहुतसे पदार्थोंमें जा पहुँचती है ।’ इसीप्रकार यद्यपि केवलज्ञानप्राप्त आत्मा अपने प्रदेशोंके द्वारा ज्ञेय पदार्थोंको स्पर्श नहीं करता इसलिये वह निश्चयसे तो ज्ञेयोंमें अप्रविष्ट है तथापि ज्ञायक -दर्शक शक्तिकी किसी परम अद्भुत विचित्रताके कारण (निश्चयसे दूर रहकर भी) वह समस्त ज्ञेयाकारोंको जानता -देखता है, इसलिये व्यवहारसे यह कहा जाता है कि ‘आत्मा सर्वद्रव्य -पर्यायोंमें प्रविष्ट हो जाता है ।’ इसप्रकार व्यवहारसे ज्ञेय पदार्थोंमें आत्माका प्रवेश सिद्ध होता है ।।२९।।
अब, यहाँ इसप्रकार (दृष्टान्तपूर्वक) यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान पदार्थोंमें प्रवृत्त होता है : —
अन्वयार्थ : — [यथा ] जैसे [इह ] इस जगतमें [दुग्धाध्युषितं ] दूधमें पड़ा हुआ [इन्द्रनीलं रत्नं ] इन्द्रनील रत्न [स्वभासा ] अपनी प्रभाके द्वारा [तद् अपि दुग्धं ] उस दूधमें [अभिभूय ] व्याप्त होकर [वर्तते ] वर्तता है, [तथा ] उसीप्रकार [ज्ञानं ] ज्ञान (अर्थात् ज्ञातृद्रव्य) [अर्थेषु ] पदार्थोंमें व्याप्त होकर वर्तता है ।।३०।।
टीका : — जैसे दूधमें पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न अपने प्रभासमूहसे दूधमें व्याप्त होकर
ज्यम दूधमां स्थित इन्द्रनीलमणि स्वकीय प्रभा वड़े दूधने विषे व्यापी रहे, त्यम ज्ञान पण अर्थो विषे.३०.
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संवेदनमप्यात्मनोऽभिन्नत्वात् कर्त्रंशेनात्मतामापन्नं करणांशेन ज्ञानतामापन्नेन कारणभूता- नामर्थानां कार्यभूतान् समस्तज्ञेयाकारानभिव्याप्य वर्तमानं, कार्य कारणत्वेनोपचर्य ज्ञानमर्थान- भिभूय वर्तत इत्युच्यमानं न विप्रतिषिध्यते ।।३०।।
जदि ते ण संति अट्ठा णाणे णाणं ण होदि सव्वगयं ।
सव्वगयं वा णाणं कहं ण णाणट्ठिया अट्ठा ।।३१।। युगपदेव सर्वपदार्थेषु परिच्छित्त्याकारेण वर्तते । अयमत्र भावार्थः ---कारणभूतानां सर्वपदार्थानां कार्यभूताः परिच्छित्त्याकारा उपचारेणार्था भण्यन्ते, तेषु च ज्ञानं वर्तत इति भण्यमानेऽपि व्यवहारेण दोषो नास्तीति ।।३०।। अथ पूर्वसूत्रेण भणितं ज्ञानमर्थेषु वर्तते व्यवहारेणात्र पुनरर्था ज्ञाने वर्तन्त इत्युपदिशति – जइ यदि चेत् ते अट्ठा ण संति ते पदार्थाः स्वकीयपरिच्छित्त्याकारसमर्पणद्वारेणादर्शे बिम्बवन्न सन्ति । क्व । णाणे केवलज्ञाने । णाणं ण होदि सव्वगयं तदा ज्ञानं सर्वगतं न भवति । सव्वगयं वर्तता हुआ दिखाई देता है, उसीप्रकार १संवेदन(ज्ञान) भी आत्मासे अभिन्न होनेसे कर्ता – अंशसे आत्मताको प्राप्त होता हुआ ज्ञानरूप कारण -अंशके द्वारा २कारणभूत पदार्थोंके कार्यभूत समस्त ज्ञेयाकारोंमें व्याप्त होता हुआ वर्तता है, इसलिये कार्यमें कारणका (-ज्ञेयाकारोंमें पदार्थोंका) उपचार करके यह कहनेमें विरोध नहीं आता कि ‘ज्ञान पदार्थोंमें व्याप्त होकर वर्तता है ।’
भावार्थ : — जैसे दूधसे भरे हुए पात्रमें पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न (नीलमणि) सारे दूधको (अपनी प्रभासे नीलवर्ण कर देता है इसलिये व्यवहारसे रत्न और रत्नकी प्रभा सारे दूधमें) व्याप्त कही जाती है, इसीप्रकार ज्ञेयोंसे भरे हुए विश्वमें रहनेवाला आत्मा समस्त ज्ञेयोंको (लोकालोकको) अपनी ज्ञानप्रभाके द्वारा प्रकाशित करता है अर्थात् जानता है इसलिये व्यवहारसे आत्माका ज्ञान और आत्मा सर्वव्यापी कहलाता है । (यद्यपि निश्चयसे वे अपने असंख्य प्रदेशोंमें ही रहते हैं, ज्ञेयोंमें प्रविष्ट नहीं होते) ।।३०।।
अब, ऐसा व्यक्त करते हैं कि इस प्रकार पदार्थ ३ज्ञानमें वर्तते हैं : —
नव होय अर्थो ज्ञानमां, तो ज्ञान सौ -गत पण नहीं, ने सर्वगत छे ज्ञान तो क्यम ज्ञानस्थित अर्थो नहीं ?.३१.
१. प्रमाणदृष्टिसे संवेदन अर्थात् ज्ञान कहने पर अनन्त गुणपर्यायोंका पिंड समझमें आता है । उसमें यदि कर्ता, करण आदि अंश किये जायें तो कर्ता – अंश वह अखंड आत्मद्रव्य है और करण -अंश वह ज्ञानगुण है ।
२. पदार्थ कारण हैं और उनके ज्ञेयाकार (द्रव्य -गुण -पर्याय) कार्य हैं ।
३. इस गाथामें भी ‘ज्ञान’ शब्दसे अनन्त गुण -पर्यायोंका पिंडरूप ज्ञातृद्रव्य समझना चाहिये ।
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यदि ते न सन्त्यर्था ज्ञाने ज्ञानं न भवति सर्वगतम् ।
सर्वगतं वा ज्ञानं कथं न ज्ञानस्थिता अर्थाः ।।३१।।
यदि खलु निखिलात्मीयज्ञेयाकारसमर्पणद्वारेणावतीर्णाः सर्वेऽर्था न प्रतिभान्ति ज्ञाने तदा तन्न सर्वगतमभ्युपगम्येत । अभ्युपगम्येत वा सर्वगतं, तर्हि साक्षात् संवेदनमुकुरुन्द- भूमिकावतीर्ण(प्रति)बिम्बस्थानीयस्वीयस्वीयसंवेद्याकारकारणानि परम्परया प्रतिबिम्बस्थानीय- संवेद्याकारकारणानीति कथं न ज्ञानस्थायिनोऽर्था निश्चीयन्ते ।। ३१ ।। वा णाणं व्यवहारेण सर्वगतं ज्ञानं सम्मतं चेद्भवतां कहं ण णाणट्ठिया अट्ठा तर्हि व्यवहारनयेन स्वकीयज्ञेयाकारपरिच्छित्तिसमर्पणद्वारेण ज्ञानस्थिता अर्थाः कथं न भवन्ति किंतु भवन्त्येवेति । अत्रायमभिप्रायः --यत एव व्यवहारेण ज्ञेयपरिच्छित्त्याकारग्रहणद्वारेण ज्ञानं सर्वगतं भण्यते, तस्मादेव ज्ञेयपरिच्छित्त्याकारसमर्पणद्वारेण पदार्था अपि व्यवहारेण ज्ञानगता भण्यन्त इति ।।३१।। अथ ज्ञानिनः पदार्थैः सह यद्यपि व्यवहारेण ग्राह्यग्राहकसम्बन्धोऽस्ति तथापि संश्लेषादिसम्बन्धो नास्ति, तेन कारणेन ज्ञेयपदार्थैः सह भिन्नत्वमेवेति प्रतिपादयति — गेण्हदि णेव ण
अन्वयार्थ : — [यदि ] यदि [ते अर्थाः ] वे पदार्थ [ज्ञाने न संति ] ज्ञानमें न हों तो [ज्ञानं ] ज्ञान [सर्वगतं ] सर्वगत [न भवति ] नहीं हो सकता [वा ] और यदि [ज्ञानं सर्वगतं ] ज्ञान सर्वगत है तो [अर्थाः ] पदार्थ [ज्ञानस्थिताः ] ज्ञानस्थित [कथं न ] कैसे नहीं हैं ? (अर्थात् अवश्य हैं) ।।३१।।
टीका : — यदि समस्त स्व -ज्ञेयाकारोंके समर्पण द्वारा (ज्ञानमें) अवतरित होते हुए समस्त पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित न हों तो वह ज्ञान सर्वगत नहीं माना जाता । और यदि वह (ज्ञान) सर्वगत माना जाये, तो फि र (पदार्थ) साक्षात् ज्ञानदर्पण -भूमिकामें अवतरित १बिम्बकी भाँति अपने -अपने ज्ञेयाकारोंके कारण (होनेसे) और २परम्परासे प्रतिबिम्बके समान ज्ञेयाकारोंके कारण होनेसे पदार्थ कैसे ज्ञानस्थित निश्चित् नहीं होते ? (अवश्य ही ज्ञानस्थित निश्चित होते हैं)
भावार्थ : — दर्पणमें मयूर, मन्दिर, सूर्य, वृक्ष इत्यादिके प्रतिबिम्ब पड़ते हैं । वहाँ निश्चयसे तो प्रतिबिम्ब दर्पणकी ही अवस्थायें हैं, तथापि दर्पणमें प्रतिबिम्ब देखकर ३कार्यमें कारणका उपचार करके व्यवहारसे कहा जाता है कि ‘मयूरादिक दर्पणमें हैं ।’ इसीप्रकार
ज्ञेयाकार बिम्ब समान हैं और ज्ञानमें होनेवाले ज्ञानकी अवस्थारूप ज्ञेयाकार प्रतिबिम्ब समान हैं) ।
कारण हैं ) और परम्परासे ज्ञानकी अवस्थारूप ज्ञेयाकारोंके (ज्ञानाकारोंके) कारण हैं ।
१. बिम्ब = जिसका दर्पणमें प्रतिबिंब पड़ा हो वह । (ज्ञानको दर्पणकी उपमा दी जाये तो, पदार्थोंके
२. पदार्थ साक्षात् स्वज्ञेयाकारोंके कारण हैं (अर्थात् पदार्थ अपने -अपने द्रव्य -गुण -पर्यायोंके साक्षात्
३. प्रतिबिम्ब नैमित्तिक कार्य हैं और मयूरादि निमित्त -कारण हैं ।
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अथैवं ज्ञानिनोऽर्थैः सहान्योन्यवृत्तिमत्त्वेऽपि परग्रहणमोक्षणपरिणमनाभावेन सर्वं पश्यतोऽध्यवस्यतश्चात्यन्तविविक्तत्वं भावयति —
मुंचदि गृह्णाति नैव मुञ्चति नैव ण परं परिणमदि परं परद्रव्यं ज्ञेयपदार्थं नैव परिणमति । स कः कर्ता । केवली भगवं केवली भगवान् सर्वज्ञः । ततो ज्ञायते परद्रव्येण सह भिन्नत्वमेव । तर्हि किं ज्ञानदर्पणमें भी सर्व पदार्थोंके समस्त ज्ञेयाकारोंके प्रतिबिम्ब पड़ते हैं अर्थात् पदार्थोंके ज्ञेयाकारोंके निमित्तसे ज्ञानमें ज्ञानकी अवस्थारूप ज्ञेयाकार होते हैं (क्योंकि यदि ऐसा न हो तो ज्ञान सर्व पदार्थोंको नहीं जान सकेगा) । वहाँ निश्चयसे ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकार ज्ञानकी ही अवस्थायें है, पदार्थोंके ज्ञेयाकार कहीं ज्ञानमें प्रविष्ट नहीं है । निश्चयसे ऐसा होने पर भी व्यवहारसे देखा जाये तो, ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकारोंके कारण पदार्थोंके ज्ञेयाकार हैं, और उनके कारण पदार्थ हैं — इसप्रकार परम्परासे ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकारोंके कारण पदार्थ हैं; इसलिये उन (ज्ञानकी अवस्थारूप) ज्ञेयाकारोंको ज्ञानमें देखकर, कार्यमें कारणका उपचार करके व्यवहारसे ऐसा कहा जा सकता है कि ‘पदार्थ ज्ञानमें हैं’ ।।३१।।
अब, इसप्रकार (व्यवहारसे) आत्माकी पदार्थोंके साथ एक दूसरेंमें प्रवृत्ति होने पर भी, (निश्चयसे) वह परका ग्रहण -त्याग किये बिना तथा पररूप परिणमित हुए बिना सबको देखता -जानता है इसलिये उसे (पदार्थोंके साथ) अत्यन्त भिन्नता है ऐसा बतलाते हैं : —
अन्वयार्थ : — [केवली भगवान् ] केवली भगवान [परं ] परको [न एव गृह्णाति ] ग्रहण नहीं करते, [न मुंचति ] छोड़ते नहीं, [न परिणमति ] पररूप परिणमित नहीं होते; [सः ] वे [निरवशेषं सर्वं ] निरवशेषरूपसे सबको (सम्पूर्ण आत्माको, सर्व ज्ञेयोंको) [समन्ततः ] सर्व ओरसे (सर्व आत्मप्रदेशोंसे) [पश्यति जानाति ] देखते – जानते हैं ।।३२।।
प्रभु केवली न ग्रहे, न छोडे, पररूपे नव परिणमे; देखे अने जाणे निःशेषे सर्वतः ते सर्वने.३२.
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अयं खल्वात्मा स्वभावत एव परद्रव्यग्रहणमोक्षणपरिणमनाभावात्स्वतत्त्वभूतकेवल- ज्ञानस्वरूपेण विपरिणम्य निष्कम्पोन्मज्जज्ज्योतिर्जात्यमणिकल्पो भूत्वाऽवतिष्ठमानः समन्ततः स्फु रितदर्शनज्ञानशक्तिः, समस्तमेव निःशेषतयात्मानमात्मनात्मनि संचेतयते । अथवा युगपदेव सर्वार्थसार्थसाक्षात्करणेन ज्ञप्तिपरिवर्तनाभावात् संभावितग्रहणमोक्षणलक्षणक्रियाविरामः प्रथममेव समस्तपरिच्छेद्याकारपरिणतत्वात् पुनः परमाकारान्तरमपरिणममानः समन्ततोऽपि विश्वमशेषं पश्यति जानाति च । एवमस्यात्यन्तविविक्तत्वमेव ।।३२।। परद्रव्यं न जानाति । पेच्छदि समंतदो सो जाणदि सव्वं णिरवसेसं तथापि व्यवहारनयेन पश्यति समन्ततः सर्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैर्जानाति च सर्वं निरवशेषम् । अथवा द्वितीयव्याख्यानम् — अभ्यन्तरे कामक्रोधादि बहिर्विषये पञ्चेन्द्रियविषयादिकं बहिर्द्रव्यं न गृह्णाति, स्वकीयानन्तज्ञानादिचतुष्टयं च न मुञ्चति यतस्ततः कारणादयं जीवः केवलज्ञानोत्पत्तिक्षण एव युगपत्सर्वं जानन्सन् परं विकल्पान्तरं न परिणमति । तथाभूतः सन् किं करोति । स्वतत्त्वभूतकेवलज्ञानज्योतिषा जात्यमणिकल्पो निःकम्पचैतन्यप्रकाशो भूत्वा स्वात्मानं स्वात्मना स्वात्मनि जानात्यनुभवति । तेनापि कारणेन परद्रव्यैः सह भिन्नत्वमेवेत्यभिप्रायः ।।३२।। एवं ज्ञानं ज्ञेयरूपेण न परिणमतीत्यादिव्याख्यानरूपेण तृतीयस्थले
टीका : — यह आत्मा, स्वभावसे ही परद्रव्यके ग्रहण -त्यागका तथा परद्रव्यरूपसे परिणमित होनेका (उसके) अभाव होनेसे, स्वतत्त्वभूत केवलज्ञानरूपसे परिणमित होकर निष्कंप निकलनेवाली ज्योतिवाला उत्तम मणि जैसा होकर रहता हुआ, (१) जिसके सर्व ओरसे (सर्व आत्मप्रदेशोंसे) दर्शनज्ञानशक्ति स्फु रित है ऐसा होता हुआ, निःशेषरूपसे परिपूर्ण आत्माको आत्मासे आत्मामें संचेतता -जानता -अनुभव करता है, अथवा (२) एकसाथ ही सर्व पदार्थोंके समूहका २साक्षात्कार करनेके कारण ज्ञप्तिपरिवर्तनका अभाव होनेसे जिसके परिणमित होनेसे फि र पररूपसे — ४आकारान्तररूपसे नहीं परिणमित होता हुआ सर्व प्रकारसे अशेष विश्वको, (मात्र) देखता -जानता है । इसप्रकार (पूर्वोक्त दोनों प्रकारसे) उसका (आत्माका पदार्थोंसे) अत्यन्त भिन्नत्व ही है ।
भावार्थ : — केवलीभगवान सर्व आत्मप्रदेशोंसे अपनेको ही अनुभव करते रहते हैं; इसप्रकार वे परद्रव्योंसे सर्वथा भिन्न हैं । अथवा, केवली भगवानको सर्व पदार्थोंका युगपत्
३ग्रहणत्यागरूप क्रिया विरामको प्राप्त हुई है ऐसा होता हुआ, पहलेसे ही समस्त ज्ञेयाकाररूप
१. निःशेषरूपसे = कुछ भी किंचित् मात्र शेष न रहे इसप्रकार से ।
२. साक्षात्कार करना = प्रत्यक्ष जानना ।
३. ज्ञप्तिक्रियाका बदलते रहना अर्थात् ज्ञानमें एक ज्ञेयको ग्रहण करना और दूसरेको छोड़ना सो ग्रहण -त्याग है; इसप्रकारका ग्रहण -त्याग वह क्रिया है, ऐसी क्रियाका केवलीभगवानके अभाव हुआ है ।
४. आकारान्तर = अन्य आकार ।
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गाथापञ्चकं गतम् । अथ यथा निरावरणसकलव्यक्तिलक्षणेन केवलज्ञानेनात्मपरिज्ञानं भवति तथा सावरणैकदेशव्यक्तिलक्षणेन केवलज्ञानोत्पत्तिबीजभूतेन स्वसंवेदनज्ञानरूपभावश्रुतेनाप्यात्मपरिज्ञानं भवतीति निश्चिनोति । अथवा द्वितीयपातनिका --यथा केवलज्ञानं प्रमाणं भवति तथा केवल- ज्ञानप्रणीतपदार्थप्रकाशकं श्रुतज्ञानमपि परोक्षप्रमाणं भवतीति पातनिकाद्वयं मनसि धृत्वा सूत्रमिदं प्रतिपादयति ---जो यः कर्ता हि स्फु टं सुदेण निर्विकारस्वसंवित्तिरूपभावश्रुतपरिणामेन विजाणदि ज्ञान होता है इसलिये उनका ज्ञान एक ज्ञेयमेंसे दूसरेमें और दूसरेसे तीसरेमें नहीं बदलता तथा उन्हें कुछ भी जानना शेष नहीं रहता इसलिये उनका ज्ञान किसी विशेष ज्ञेयाकारको जाननेके प्रति भी नहीं जाता; इसप्रकार भी वे परसे सर्वथा भिन्न हैं । [यदि जाननक्रिया बदलती हो तभी उसे विकल्प (पर -निमित्तक रागद्वेष) हो सकते हैं और तभी इतना परद्रव्यके साथका सम्बन्ध कहलाता है । किन्तु केवलीभगवानकी ज्ञप्तिका परिवर्तन नहीं होता इसलिये वे परसे अत्यन्त भिन्न हैं । ] इसप्रकार केवलज्ञानप्राप्त आत्मा परसे अत्यन्त भिन्न होनेसे और प्रत्येक आत्मा स्वभावसे केवलीभगवान जैसा ही होनेसे यह सिद्ध हुआ कि निश्चयसे प्रत्येक आत्मा परसे भिन्न है ।।३२।।
अब केवलज्ञानीको और श्रुतज्ञानीको अविशेषरूपसे दिखाकर विशेष आकांक्षाके क्षोभका क्षय करते हैं (अर्थात् केवलज्ञानीमें और श्रुतज्ञानीमें अन्तर नहीं है ऐसा बतलाकर विशेष जाननेकी इच्छाके क्षोभको नष्ट करते हैं ) : —
अन्वयार्थ : — [यः हि ] जो वास्तवमें [श्रुतेन ] श्रुतज्ञानके द्वारा [स्वभावेन ज्ञायकं ] स्वभावसे ज्ञायक (अर्थात् ज्ञायाकस्वभाव) [आत्मानं ] आत्माको [विजानाति ] जानता है [तं ] उसे [लोकप्रदीपकराः ] लोकके प्रकाशक [ऋषयः ] ऋषीश्वरगण [श्रुतकेवलिनं भणन्ति ] श्रुतकेवली कहते हैं ।।३३।।
श्रुतज्ञानथी जाणे खरे ज्ञायकस्वभावी आत्मने, ऋषिओ प्रकाशक लोकना श्रुतकेवली तेने कहे. ३३.
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यथा भगवान् युगपत्परिणतसमस्तचैतन्यविशेषशालिना केवलज्ञानेनानादिनिधन- निष्कारणासाधारणस्वसंचेत्यमानचैतन्यसामान्यमहिम्नश्चेतकस्वभावेनैकत्वात् केवलस्यात्मन आत्मनात्मनि संचेतनात् केवली, तथायं जनोऽपि क्रमपरिणममाणकतिपयचैतन्यविशेष- शालिना श्रुतज्ञानेनानादिनिधननिष्कारणासाधारणस्वसंचेत्यमानचैतन्यसामान्यमहिम्नश्चेतक- स्वभावेनैकत्वात् केवलस्यात्मन आत्मनात्मनि संचेतनात् श्रुतकेवली । अलं विशेषा- कांक्षाक्षोभेण, स्वरूपनिश्चलैरेवावस्थीयते ।।३३।। विजानाति विशेषेण जानाति विषयसुखानन्दविलक्षणनिजशुद्धात्मभावनोत्थपरमानन्दैकलक्षणसुख- रसास्वादेनानुभवति । कम् । अप्पाणं निजात्मद्रव्यम् । जाणगं ज्ञायकं केवलज्ञानस्वरूपम् । केन कृत्वा । सहावेण समस्तविभावरहितस्वस्वभावेन । तं सुयकेवलिं तं महायोगीन्द्रं श्रुतकेवलिनं भणंति कथयन्ति । के कर्तारः । इसिणो ऋषयः । किंविशिष्टाः । लोगप्पदीवयरा लोकप्रदीपक रा लोकप्रकाशका इति । अतो विस्तरः ---युगपत्परिणतसमस्तचैतन्यशालिना केवलज्ञानेन अनाद्यनन्तनिष्कारणान्य- द्रव्यासाधारणस्वसंवेद्यमानपरमचैतन्यसामान्यलक्षणस्य परद्रव्यरहितत्वेन केवलस्यात्मन आत्मनि स्वानुभवनाद्यथा भगवान् केवली भवति, तथायं गणधरदेवादिनिश्चयरत्नत्रयाराधकजनोऽपि
टीका : — जैसे भगवान, युगपत् परिणमन करते हुए समस्त चैतन्यविशेषयुक्त केवलज्ञानके द्वारा, १अनादिनिधन -२निष्कारण -३असाधारण -४स्वसंवेद्यमान चैतन्यसामान्य जिसकी महिमा है तथा जो ५चेतकस्वभावसे एकत्व होनेसे केवल (अकेला, शुद्ध, अखंड) है ऐसे आत्माको आत्मासे आत्मामें अनुभव करनेके कारण केवली हैं; उसीप्रकार हम भी, क्रमशः परिणमित होते हुए कितने ही चैतन्यविशेषोंसेयुक्त श्रुतज्ञानके द्वारा, अनादिनिधन- निष्कारण -असाधारण -स्वसंवेद्यमान -चैतन्यसामान्य जिसकी महिमा है तथा जो चेतक स्वभावके द्वारा एकत्व होने से ६केवल (अकेला) है ऐसे आत्माको आत्मासे आत्मामें अनुभव करनेके कारण श्रुतकेवली हैं । (इसलिये) विशेष आकांक्षाके क्षोभसे बस हो; (हम तो) स्वरूपनिश्चल ही रहते हैं ।
१. अनादिनिधन = अनादि -अनन्त (चैतन्यसामान्य आदि तथा अन्त रहित है) ।
२. निष्कारण = जिसका कोई कारण नहीं हैं ऐसा; स्वयंसिद्ध; सहज ।
३. असाधारण = जो अन्य किसी द्रव्यमें न हो, ऐसा ।
४. स्वसंवेद्यमान = स्वतः ही अनुभवमें आनेवाला ।
५. चेतक = चेतनेवाला; दर्शकज्ञायक ।
६. आत्मा निश्चयसे परद्रव्यके तथा रागद्वेषादिके संयोगों तथा गुणपर्यायके भेदोंसे रहित, मात्र चेतकस्वभावरूप ही है, इसलिये वह परमार्थसे केवल (अकेला, शुद्ध, अखण्ड) है ।
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पूर्वोक्तलक्षणस्यात्मनो भावश्रुतज्ञानेन स्वसंवेदनान्निश्चयश्रुतकेवली भवतीति । किंच --यथा कोऽपि देवदत्त आदित्योदयेन दिवसे पश्यति, रात्रौ किमपि प्रदीपेनेति । तथादित्योदयस्थानीयेन केवलज्ञानेन दिवसस्थानीयमोक्षपर्याये भगवानात्मानं पश्यति, संसारी विवेकिजनः पुनर्निशास्थानीयसंसारपर्याये
भावार्थ : — भगवान समस्त पदार्थोंको जानते हैं, मात्र इसलिये ही वे ‘केवली’ नहीं कहलाते, किन्तु केवल अर्थात् शुद्ध आत्माको जानने -अनुभव करनेसे ‘केवली’ कहलाते हैं । केवल (-शुद्ध) आत्माके जानने -अनुभव करनेवाला श्रुतज्ञानी भी ‘श्रुतकेवली’ कहलाता है । केवली और श्रुतकेवलीमें इतना मात्र अन्तर है कि — जिसमें चैतन्यके समस्त विशेष एक ही साथ परिणमित होते हैं ऐसे केवलज्ञानके द्वारा केवली केवल आत्माका अनुभव करते हैं जिसमें चैतन्यके कुछ विशेष क्रमशः परिणमित होते हैं ऐसे श्रुतज्ञानके द्वारा श्रुतकेवली केवल आत्माका अनुभव करते हैं; अर्थात्, केवली सूर्यके समान केवलज्ञानके द्वारा आत्माको देखते और अनुभव करते हैं तथा श्रुतकेवली दीपकके समान श्रुतज्ञानके द्वारा आत्माको देखते और अनुभव करते हैं, इसप्रकार केवली और श्रुतकेवलीमें स्वरूपस्थिरताकी तरतमतारूप भेद ही मुख्य है, कम- बढ़ (पदार्थ) जाननेरूप भेद अत्यन्त गौण है । इसलिये अधिक जाननेकी इच्छाका क्षोभ छोड़कर स्वरूपमें ही निश्चल रहना योग्य है । यही केवलज्ञान -प्राप्तिका उपाय है ।।३३।।
अब, ज्ञानके श्रुत -उपाधिकृत भेदको दूर करते हैं (अर्थात् ऐसा बतलाते हैं कि श्रुतज्ञान भी ज्ञान ही है, श्रुतरूप उपाधिके कारण ज्ञानमें कोई भेद नहीं होता) : —
अन्वयार्थ : — [सूत्रं ] सूत्र अर्थात् [पुद्गलद्रव्यात्मकैः वचनैः ] पुद्गलद्रव्यात्मक वचनोंके द्वारा [जिनोपदिष्टं ] जिनेन्द्र भगवानके द्वारा उपदिष्ट वह [तज्ज्ञप्तिः ही ] उसकी ज्ञप्ति [ज्ञानं ] ज्ञान है [च ] और उसे [सूत्रस्य ज्ञप्तिः ] सूत्रकी ज्ञप्ति (श्रुतज्ञान) [भणिता ] कहा गया है ।।३४।।
छे ज्ञप्ति तेनी ज्ञान, तेने सूत्रनी ज्ञप्ति कहे. ३४.
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श्रुतं हि तावत्सूत्रम् । तच्च भगवदर्हत्सर्वज्ञोपज्ञं स्यात्कारकेतनं पौद्गलिकं शब्दब्रह्म । तज्ज्ञप्तिर्हि ज्ञानम् । श्रुतं तु तत्कारणत्वात् ज्ञानत्वेनोपचर्यत एव । एवं सति सूत्रस्य ज्ञप्तिः श्रुतज्ञानमित्यायाति । अथ सूत्रमुपाधित्वान्नाद्रियते ज्ञप्तिरेवावशिष्यते । सा च केवलिनः श्रुतकेवलिनश्चात्मसंचेतने तुल्यैव इति नास्ति ज्ञानस्य श्रुतोपाधिभेदः ।। ३४ ।। प्रदीपस्थानीयेन रागादिविकल्परहितपरमसमाधिना निजात्मानं पश्यतीति । अयमत्राभिप्रायः ---आत्मा परोक्षः, कथं ध्यानं क्रियते इति सन्देहं कृत्वा परमात्मभावना न त्याज्येति ।।३३।। अथ शब्दरूपं द्रव्यश्रुतं व्यवहारेण ज्ञानं निश्चयेनार्थपरिच्छित्तिरूपं भावश्रुतमेव ज्ञानमिति कथयति । अथवात्मभावनारतो निश्चयश्रुतकेवली भवतीति पूर्वसूत्रे भणितम् । अयं तु व्यवहारश्रुतकेवलीति कथ्यते ---सुत्तं द्रव्यश्रुतम् । कथम्भूतम् । जिणोवदिट्ठं जिनोपदिष्टम् । कैः कृत्वा । पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं पुद्गलद्रव्यात्मकैर्दिव्यध्वनिवचनैः । तं जाणणा हि णाणं तेन पूर्वोक्त शब्दश्रुताधारेण ज्ञप्तिरर्थपरि- च्छित्तिर्ज्ञानं भण्यते हि स्फु टम् । सुत्तस्स य जाणणा भणिया पूर्वोक्तद्रव्यश्रुतस्यापि व्यवहारेण ज्ञानव्यपदेशो भवति न तु निश्चयेनेति । तथा हि --यथा निश्चयेन शुद्धबुद्धैकस्वभावो जीवः पश्चाद्वयवहारेण नरनारकादिरूपोऽपि जीवो भण्यते; तथा निश्चयेनाखण्डैकप्रतिभासरूपं समस्त- वस्तुप्रकाशकं ज्ञानं भण्यते, पश्चाद्वयवहारेण मेघपटलावृतादित्यस्यावस्थाविशेषवत्कर्मपटलावृता- खण्डैकज्ञानरूपजीवस्य मतिज्ञानश्रुतज्ञानादिव्यपदेशो भवतीति भावार्थः ।।३४।। अथ भिन्नज्ञानेनात्मा
टीका : — प्रथम तो श्रुत ही सूत्र है; और वह सूत्र भगवान अर्हन्त – सर्वज्ञके द्वारा स्वयं जानकर उपदिष्ट १स्यात्कार चिह्नयुक्त, पौदगलिक शब्दब्रह्म है । उसकी २ज्ञप्ति (-शब्दब्रह्मको जाननेवाली ज्ञातृक्रिया) सो ज्ञान है; श्रुत (-सूत्र) तो उसका (-ज्ञानका) कारण होनेसे ज्ञानके रूपमें उपचारसे ही कहा जाता है (जैसे कि अन्नको प्राण कहा जाता है) । ऐसा होनेसे यह फलित हुआ कि ‘सूत्रकी ज्ञप्ति’ सो श्रुतज्ञान है । अब यदि सूत्र तो उपाधि होनेसे उसका आदर न किया जाये तो ‘ज्ञप्ति’ ही शेष रह जाती है; (‘सूत्रकी ज्ञप्ति’ कहने पर निश्चयसे ज्ञप्ति कहीं पौद्गलिक सूत्रकी नहीं, किन्तु आत्माकी है; सूत्र ज्ञप्तिका स्वरूपभूत नहीं, किन्तु विशेष वस्तु अर्थात् उपाधि है; क्योंकि सूत्र न हो तो वहाँ भी ज्ञप्ति तो होती ही है । इसलिये यदि सूत्रको न गिना जाय तो ‘ज्ञप्ति’ ही शेष रहती है ।) और वह (-ज्ञप्ति) केवली और श्रुतकेवलीके आत्मानुभवनमें समान ही है । इसलिये ज्ञानमें श्रुत- उपाधिकृत भेद नहीं है ।।३४।।
१. स्यात्कार = ‘स्यात्’ शब्द । (स्यात् = कथंचित्; किसी अपेक्षासे)
२. ज्ञप्ति = जानना; जाननेकी क्रिया; जाननक्रिया ।
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अथात्मज्ञानयोः कर्तृकरणताकृतं भेदमपनुदति — जो जाणदि सो णाणं ण हवदि णाणेण जाणगो आदा ।
अपृथग्भूतकर्तृकरणत्वशक्तिपारमैश्वर्ययोगित्वादात्मनो य एव स्वयमेव जानाति स एव ज्ञानमन्तर्लीनसाधकतमोष्णत्वशक्तेः स्वतंत्रस्य जातवेदसो दहनक्रियाप्रसिद्धेरुष्ण- ज्ञानी न भवतीत्युपदिशति — जो जाणदि सो णाणं यः कर्ता जानाति स ज्ञानं भवतीति । तथा हि — यथा संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि सति पश्चादभेदनयेन दहनक्रियासमर्थोष्णगुणेन परिणतो- ऽग्निरप्युष्णो भण्यते, तथार्थक्रियापरिच्छित्तिसमर्थज्ञानगुणेन परिणत आत्मापि ज्ञानं भण्यते । तथा चोक्तम् – ‘जानातीति ज्ञानमात्मा’ । ण हवदि णाणेण जाणगो आदा सर्वथैव भिन्नज्ञानेनात्मा ज्ञायको न
अब, आत्मा और ज्ञानका कर्त्तृत्व -करणत्वकृत भेद दूर करते हैं (अर्थात् परमार्थतः अभेद आत्मामें, ‘आत्मा ज्ञातृक्रियाका कर्ता है और ज्ञान करण है’ ऐसा व्यवहारसे भेद किया जाता है, तथापि आत्मा और ज्ञान भिन्न नहीं हैं इसलिये अभेदनयसे ‘आत्मा ही ज्ञान है’ ऐसा समझाते हैं) : —
अन्वयार्थ : — [यः जानाति ] जो जानता है [सः ज्ञानं ] सो ज्ञान है (अर्थात् जो ज्ञायक है वही ज्ञान है), [ज्ञानेन ] ज्ञानके द्वारा [आत्मा ] आत्मा [ज्ञायकः भवति ] ज्ञायक है [न ] ऐसा नहीं है । [स्वयं ] स्वयं ही [ज्ञानं परिणमते ] ज्ञानरूप परिणमित होता है [सर्वे अर्थाः ] और सर्व पदार्थ [ज्ञानस्थिताः ] ज्ञानस्थित हैं ।।३५।।
टीका : — आत्मा अपृथग्भूत कर्तृत्व और करणत्वकी शक्तिरूप १पारमैश्वर्यवान होनेसे जो स्वयमेव जानता है (अर्थात् जो ज्ञायक है) वही ज्ञान है; जैसे – जिसमें २साधकतम उष्णत्वशक्ति अन्तर्लीन है, ऐसी ३स्वतंत्र अग्निके ४दहनक्रियाकी प्रसिद्धि होनेसे उष्णता कही जाती है । परन्तु ऐसा नहीं है कि जैसे पृथग्वर्ती हँसियेसे देवदत्त काटनेवाला कहलाता है उसीप्रकार
जे जाणतो ते ज्ञान, नहि जीव ज्ञानथी ज्ञायक बने; पोते प्रणमतो ज्ञानरूप, ने ज्ञानस्थित सौ अर्थ छे. ३५.
१. पारमैश्वर्य = परम सामर्थ्य; परमेश्वरता । २.साधकतम = उत्कृष्ट साधन वह करण ।
३. जो स्वतंत्र रूपसे करे वह कर्ता ।
४. अग्नि जलानेकी क्रिया करती है, इसलिये उसे उष्णता कहा जाता है ।
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व्यपदेशवत् । न तु यथा पृथग्वर्तिना दात्रेण लावको भवति देवदत्तस्तथा ज्ञानेन ज्ञायको भवत्यात्मा । तथा सत्युभयोरचेतनत्वमचेतनयोः संयोगेऽपि न परिच्छित्तिनिष्पत्तिः । पृथक्त्व- वर्तिनोरपि परिच्छेदाभ्युपगमे परपरिच्छेदेन परस्य परिच्छित्तिर्भूतिप्रभृतीनां च परिच्छित्तिप्रसूति- रनंकु शा स्यात् । किंच – स्वतोऽव्यतिरिक्तसमस्तपरिच्छेद्याकारपरिणतं ज्ञानं स्वयं परिणम- मानस्य कार्यभूतसमस्तज्ञेयाकारकारणीभूताः सर्वेऽर्था ज्ञानवर्तिन एव कथंचिद्भवन्ति; किं ज्ञातृज्ञानविभागक्लेशकल्पनया ।।३५।।
तम्हा णाणं जीवो णेयं दव्वं तिहा समक्खादं ।
दव्वं ति पुणो आदा परं च परिणामसंबद्धं ।।३६।। भवतीति । अथ मतम् --यथा भिन्नदात्रेण लावको भवति देवदत्तस्तथा भिन्नज्ञानेन ज्ञायको भवतु को दोष इति । नैवम् । छेदनक्रियाविषये दात्रं बहिरङ्गोपकरणं तद्भिन्नं भवतु, अभ्यन्तरोपकरणं तु देवदत्तस्य छेदनक्रियाविषये शक्तिविशेषस्तच्चाभिन्नमेव भवति; तथार्थपरिच्छित्तिविषये ज्ञानमेवा- भ्यन्तरोपकरणं तथाभिन्नमेव भवति, उपाध्यायप्रकाशादिबहिरङ्गोपकरणं तद्भिन्नमपि भवतु दोषो नास्ति । यदि च भिन्नज्ञानेन ज्ञानी भवति तर्हि परकीयज्ञानेन सर्वेऽपि कुम्भस्तम्भादिजडपदार्था ज्ञानिनो (पृथग्वर्ती) ज्ञानसे आत्मा जाननेवाला (-ज्ञायक) है । यदि ऐसा हो तो दोनोंके अचेतनता आ जायेगी और अचेतनोंका संयोग होने पर भी ज्ञप्ति उत्पन्न नहीं होगी । आत्मा और ज्ञानके पृथग्वर्ती होने पर भी यदि आत्माके ज्ञप्तिका होना माना जाये तो परज्ञानके द्वारा परको ज्ञप्ति हो जायेगी और इसप्रकार राख इत्यादिके भी ज्ञप्तिका उद्भव निरंकुश हो जायेगा । (‘आत्मा और ज्ञान पृथक् हैं किन्तु ज्ञान आत्माके साथ युक्त हो जाता है इसलिये आत्मा जाननेका कार्य करता है’ यदि ऐसा माना जाये तो जैसे ज्ञान आत्माके साथ युक्त होता है, उसीप्रकार राख, घड़ा, स्तंभ इत्यादि समस्त पदार्थोंके साथ युक्त हो जाये और उससे वे सब पदार्थ भी जाननेका कार्य करने लगें; किन्तु ऐसा तो नहीं होता, इसलिये आत्मा और ज्ञान पृथक् नहीं हैं ) और, अपनेसे अभिन्न ऐसे समस्त ज्ञेयाकाररूप परिणमित जो ज्ञान है उसरूप स्वयं परिणमित होनेवालेको, कार्यभूत समस्त ज्ञेयाकारोंके कारणभूत समस्त पदार्थ ज्ञानवर्ति ही कथंचित् हैं । (इसलिये) ज्ञाता और ज्ञानके विभागकी क्लिष्ट कल्पनासे क्या प्रयोजन है ? ।।३५।।
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यतः परिच्छेदरूपेण स्वयं विपरिणम्य स्वतंत्र एव परिच्छिनत्ति ततो जीव एव ज्ञानमन्यद्रव्याणां तथा परिणन्तुं परिच्छेत्तुं चाशक्तेः । ज्ञेयं तु वृत्तवर्तमानवर्तिष्यमाणविचित्र- पर्यायपरम्पराप्रकारेण त्रिधाकालकोटिस्पर्शित्वादनाद्यनन्तं द्रव्यम् । तत्तु ज्ञेयतामापद्यमानं द्वेधात्मपरविकल्पात् । इष्यते हि स्वपरपरिच्छेदकत्वादवबोधस्य बोध्यस्यैवंविधं द्वैविध्यम् ।
ननु स्वात्मनि क्रियाविरोधात् कथं नामात्मपरिच्छेदकत्वम् । का हि नाम क्रिया कीदृशश्च विरोधः । क्रिया ह्यत्र विरोधिनी समुत्पत्तिरूपा वा ज्ञप्तिरूपा वा । उत्पत्तिरूपा हि तावन्नैकं स्वस्मात्प्रजायत इत्यागमाद्विरुद्धैव । ज्ञप्तिरूपायास्तु प्रकाशनक्रिययेव प्रत्यवस्थितत्वान्न भवन्तु, न च तथा । णाणं परिणमदि सयं यत एव भिन्नज्ञानेन ज्ञानी न भवति तत एव घटोत्पत्तौ मृत्पिण्ड इव स्वयमेवोपादानरूपेणात्मा ज्ञानं परिणमति । अट्ठा णाणट्ठिया सव्वे व्यवहारेण ज्ञेयपदार्था आदर्शे बिम्बमिव परिच्छित्त्याकारेण ज्ञाने तिष्ठन्तीत्यभिप्रायः ।।३५।। अथात्मा ज्ञानं भवति शेषं तु ज्ञेयमित्यावेदयति ---तम्हा णाणं जीवो यस्मादात्मैवोपादानरूपेण ज्ञानं परिणमति तथैव पदार्थान् परिच्छिनत्ति, इति भणितं पूर्वसूत्रे, तस्मादात्मैव ज्ञानं । णेयं दव्वं तस्य ज्ञानरूपस्यात्मनो ज्ञेयं भवति । किम् । द्रव्यम् । तिहा समक्खादं तच्च द्रव्यं कालत्रयपर्यायपरिणतिरूपेण द्रव्यगुणपर्यायरूपेण वा
अन्वयार्थ : — [तस्मात् ] इसलिये [जीवः ज्ञानं ] जीव ज्ञान है [ज्ञेयं ] और ज्ञेय [त्रिधा समाख्यातं ] तीन प्रकारसे वर्णित (त्रिकालस्पर्शी) [द्रव्यं ] द्रव्य है । [पुनः द्रव्यं इति ] (वह ज्ञेयभूत) द्रव्य अर्थात् [आत्मा ] आत्मा (स्वात्मा) [परः च ] और पर [परिणामसम्बद्धः ] जोकि परिणामवाले हैं ।।३६।।
टीका : — (पूर्वोक्त प्रकार) ज्ञानरूपसे स्वयं परिणमित होकर स्वतंत्रतया ही जानता है इसलिये जीव ही ज्ञान है, क्योंकि अन्य द्रव्य इसप्रकार (ज्ञानरूप) परिणमित होने तथा जाननेमें असमर्थ हैं । और ज्ञेय, वर्त चुकी, वर्त रही और वर्तनेवाली ऐसी विचित्र पर्यायोंकी परम्पराके प्रकारसे त्रिविध कालकोटिको स्पर्श करता होनेसे अनादि -अनन्त ऐसा द्रव्य है । (आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञेय समस्त द्रव्य हैं ) वह ज्ञेयभूत द्रव्य आत्मा और पर (-स्व और पर) ऐसे दो भेदसे दो प्रकारका है । ज्ञान स्वपरज्ञायक है, इसलिये ज्ञेयकी ऐसी द्विविधता मानी जाती है ।
(प्रश्न) : — अपनेमें क्रियाके हो सकनेका विरोध है, इसलिये आत्माके स्वज्ञायकता कैसे घटित होती है ?
(उत्तर) : — कौनसी क्रिया है और किस प्रकारका विरोध है ? जो यहाँ (प्रश्नमें विरोधी क्रिया कही गई है वह या तो उत्पत्तिरूप होगी या ज्ञप्तिरूप होगी । प्रथम, उत्पत्तिरूप क्रिया तो ‘कहीं स्वयं अपनेमेंसे उत्पन्न नहीं हो सकती’ इस आगमकथनसे विरुद्ध ही है; परन्तु
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तत्र विप्रतिषेधस्यावतारः । यथा हि प्रकाशकस्य प्रदीपस्य परं प्रकाश्यतामापन्नं प्रकाशयतः स्वस्मिन् प्रकाश्ये न प्रकाशकान्तरं मृग्यं स्वयमेव प्रकाशनक्रियायाः समुपलम्भात्; तथा परिच्छेदकस्यात्मनः परं परिच्छेद्यतामापन्नं परिच्छिन्दतः स्वस्मिन् परिच्छेद्ये न परिच्छेदकान्तरं मृग्यं स्वयमेव परिच्छेदनक्रियायाः समुपलम्भात् ।
ननु कुत आत्मनो द्रव्यज्ञानरूपत्वं द्रव्याणां च आत्मज्ञेयरूपत्वं च ? परिणाम- संबन्धत्वात् । यतः खलु आत्मा द्रव्याणि च परिणामैः सह संबध्यन्ते, तत आत्मनो द्रव्यालम्बनज्ञानेन द्रव्याणां तु ज्ञानमालम्ब्य ज्ञेयाकारेण परिणतिरबाधिता प्रतपति ।।३६।। तथैवोत्पादव्ययध्रौव्यरूपेण च त्रिधा समाख्यातम् । दव्वं ति पुणो आदा परं च तच्च ज्ञेयभूतं द्रव्यमात्मा भवति परं च । कस्मात् । यतो ज्ञानं स्वं जानाति परं चेति प्रदीपवत् । तच्च स्वपरद्रव्यं कथंभूतम् । परिणामसंबद्धं कथंचित्परिणामीत्यर्थः । नैयायिकमतानुसारी कश्चिदाह ---ज्ञानं ज्ञानान्तरवेद्यं प्रमेयत्वात् ज्ञप्तिरूप क्रियामें विरोध नहीं आता, क्योंकि वह, प्रकाशन क्रियाकी भाँति, उत्पत्तिक्रियासे विरुद्ध प्रकारसे (भिन्न प्रकारसे) होती है । जैसे जो प्रकाश्यभूत परको प्रकाशित करता है ऐसे प्रकाशक दीपकको स्व प्रकाश्यको प्रकाशित करनेके सम्बन्धमें अन्य प्रकाशककी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसके स्वयमेव प्रकाशन क्रियाकी प्राप्ति है; उसीप्रकार जो ज्ञेयभूत परको जानता है ऐसे ज्ञायक आत्माको स्व ज्ञेयके जाननेके सम्बन्धमें अन्य ज्ञायककी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि स्वयमेव ज्ञान -क्रिया की प्राप्ति१ है । (इससे सिद्ध हुआ कि ज्ञान स्वको भी जान सकता है ।)
(प्रश्न) : — आत्माको द्रव्योंकी ज्ञानरूपता और द्रव्योंको आत्माकी ज्ञेयरूपता कैसे ( – किसप्रकार घटित) है ?
(उत्तर) : — वे परिणामवाले होनेसे । आत्मा और द्रव्य परिणामयुक्त हैं, इसलिये आत्माके, द्रव्य जिसका २आलम्बन हैं ऐसे ज्ञानरूपसे (परिणति), और द्रव्योंके, ज्ञानका
१.कोई पर्याय स्वयं अपनेमेंसे उत्पन्न नहीं हो सकती, किन्तु वह द्रव्यके आधारसे – द्रव्यमेंसे उत्पन्न होती है; क्योंकि यदि ऐसा न हो तो द्रव्यरूप आधारके बिना पर्यायें उत्पन्न होने लगें और जलके बिना तरंगें होने लगें; किन्तु यह सब प्रत्यक्ष विरुद्ध है; इसलिये पर्यायके उत्पन्न होनेके लिये द्रव्यरूप आधार आवश्यक है । इसीप्रकार ज्ञानपर्याय भी स्वयं अपनेमेंसे उत्पन्न नहीं हो सकती; वह आत्मद्रव्यमेंसे उत्पन्न हो सकती है — जो कि ठीक ही है । परन्तु ज्ञान पर्याय स्वयं अपनेसे ही ज्ञात नहीं हो सकती यह बात यथार्थ नहीं है । आत्म द्रव्यमेंसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानपर्याय स्वयं अपनेसे ही ज्ञात होती है । जैसे दीपकरूपी आधारमेंसे उत्पन्न होने वाली प्रकाशपर्याय स्व -परको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार आत्मारूपी आधारमेंसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानपर्याय स्वपरको जानती है । और यह अनुभव सिद्ध भी है कि ज्ञान स्वयं अपनेको जानता है ।
३अवलम्बन लेकर ज्ञेयाकाररूपसे परिणति अबाधितरूपसे तपती है — प्रतापवंत वर्तती है ।
२.ज्ञानके ज्ञेयभूत द्रव्य आलम्बन अर्थात् निमित्त हैं । यदि ज्ञान ज्ञेयको न जाने तो ज्ञानका ज्ञानत्व क्या ?
३.ज्ञेयका ज्ञान आलम्बन अर्थात् निमित्त है । यदि ज्ञेय ज्ञानमें ज्ञात न हो तो ज्ञेयका ज्ञेयत्व क्या ?
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तक्कालिगेव सव्वे सदसब्भूदा हि पज्जया तासिं ।
सर्वासामेव हि द्रव्यजातीनां त्रिसमयावच्छिन्नात्मलाभभूमिकत्वेन क्रमप्रतपत्स्वरूपसंपदः घटादिवत् । परिहारमाह --प्रदीपेन व्यभिचारः, प्रदीपस्तावत्प्रमेयः परिच्छेद्यो ज्ञेयो भवति न च प्रदीपान्तरेण प्रकाश्यते, तथा ज्ञानमपि स्वयमेवात्मानं प्रकाशयति न च ज्ञानान्तरेण प्रकाश्यते । यदि पुनर्ज्ञानान्तरेण प्रकाश्यते तर्हि गगनावलम्बिनी महती दुर्निवारानवस्था प्राप्नोतीति सूत्रार्थः ।।३६।। एवं निश्चयश्रुतकेवलिव्यवहारश्रुतकेवलिकथनमुख्यत्वेन भिन्नज्ञाननिराकरणेन ज्ञानज्ञेयस्वरूपकथनेन च चतुर्थस्थले गाथाचतुष्टयं गतम् । अथातीतानागतपर्याया वर्तमानज्ञाने सांप्रता इव दृश्यन्त इति निरूपयति — सव्वे सदसब्भूदा हि पज्जया सर्वे सद्भूता असद्भूता अपि पर्यायाः ये हि स्फु टं वट्टंते ते तेतेतेतेते (आत्मा और द्रव्य समय -समय पर परिणमन किया करते हैं, वे कूटस्थ नहीं हैं; इसलिये आत्मा ज्ञान स्वभावसे और द्रव्य ज्ञेय स्वभावसे परिणमन करता है, इसप्रकार ज्ञान स्वभावमें परिणमित आत्मा ज्ञानके आलम्बनभूत द्रव्योंको जानता है और ज्ञेय -स्वभावसे परिणमित द्रव्य ज्ञेयके आलम्बनभूत ज्ञानमें — आत्मामें — ज्ञात होते हैं ।) ।।३६।।
अब, ऐसा उद्योत करते हैं कि द्रव्योंकी अतीत और अनागत पर्यायें भी तात्कालिक पर्यायोंकी भाँति पृथक्रूपसे ज्ञानमें वर्तती हैं : —
अन्वयार्थ : — [तासाम् द्रव्यजातीनाम् ] उन (जीवादि) द्रव्यजातियोंकी [ते सर्वे ] समस्त [सदसद्भूताः हि ] विद्यमान और अविद्यमान [पर्यायाः ] पर्यायें [तात्कालिकाः इव ] तात्कालिक (वर्तमान) पर्यायोंकी भाँति, [विशेषतः ] विशिष्टतापूर्वक (अपने -अपने भिन्न- भिन्न स्वरूपमें ) [ज्ञाने वर्तन्ते ] ज्ञानमें वर्तती हैं ।।३७।।
टीका : — (जीवादिक) समस्त द्रव्यजातियोंकी पर्यायोंकी उत्पत्तिकी मर्यादा तीनोंकालकी मर्यादा जितनी होनेसे (वे तीनोंकालमें उत्पन्न हुआ करती हैं इसलिये), उनकी (उन समस्त द्रव्य -जातियोंकी), क्रमपूर्वक तपती हुई स्वरूप -सम्पदा वाली (-एकके बाद
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सद्भूतासद्भूततामायान्तो ये यावन्तः पर्यायास्ते तावन्तस्तात्कालिका इवात्यन्तसंकरेणाप्य- वधारितविशेषलक्षणा एकक्षण एवावबोधसौधस्थितिमवतरन्ति । न खल्वेतदयुक्तम् — दृष्टा- विरोधात्; द्रश्यते हि छद्मस्थस्यापि वर्तमानमिव व्यतीतमनागतं वा वस्तु चिन्तयतः संविदालम्बितस्तदाकारः । — किंच चित्रपटीस्थानीयत्वात् संविदः; यथा हि चित्रपटयामति- वाहितानामनुपस्थितानां वर्तमानानां च वस्तूनामालेख्याकाराः साक्षादेकक्षण एवावभासन्ते, तथा संविद्भित्तावपि । — किं च सर्वज्ञेयाकाराणां तादात्विक त्वाविरोधात्; यथा हि प्रध्वस्तानामनुदितानां च वस्तूनामालेख्याकारा वर्तमाना एव, तथातीतानामनागतानां च पर्यायाणां ज्ञेयाकारा वर्तमाना एव भवन्ति ।।३७।। पूर्वोक्ताः पर्याया वर्तन्ते प्रतिभासन्ते प्रतिस्फु रन्ति । क्क । णाणे केवलज्ञाने । कथंभूता इव । तक्कालिगेव तात्कालिका इव वर्तमाना इव । कासां सम्बन्धिनः । तासिं दव्वजादीणं तासां प्रसिद्धानां दूसरी प्रगट होनेवाली), विद्यमानता और अविद्यमानताको प्राप्त जो जितनी पर्यायें हैं, वे सब तात्कालिक (वर्तमानकालीन) पर्यायोंकी भाँति, अत्यन्त १मिश्रित होनेपर भी सब पर्यायोंके विशिष्ट लक्षण स्पष्ट ज्ञात हों इसप्रकार, एक क्षणमें ही, ज्ञानमंदिरमें स्थितिको प्राप्त होती हैं । यह (तीनों कालकी पर्यायोंका वर्तमान पर्यायोंकी भाँति ज्ञानमें ज्ञात होना) अयुक्त नहीं है; क्योंकि —
(१) उसका दृष्टान्तके साथ (जगतमें जो दिखाई देता है — अनुभवमें आता है उसके साथ ) अविरोध है । (जगतमें ) दिखाई देता है कि छद्मस्थके भी, जैसे वर्तमान वस्तुका चिंतवन करते हुए ज्ञान उसके आकारका अवलम्बन करता है उसीप्रकार भूत और भविष्यत वस्तुका चिंतवन करते हुए (भी) ज्ञान उसके आकारका अवलम्बन करता है ।
(२) और ज्ञान चित्रपटके समान है । जैसे चित्रपटमें अतीत, अनागत और वर्तमान वस्तुओंके २आलेख्याकार साक्षात् एक क्षणमें ही भासित होते हैं; उसीप्रकार ज्ञानरूपी भित्तिमें (-ज्ञानभूमिकामें, ज्ञानपटमें ) भी अतीत, अनागत और वर्तमान पर्यायोंके ज्ञेयाकार साक्षात् एक क्षणमें ही भासित होते हैं ।
(३) और सर्व ज्ञेयाकारोंकी तात्कालिकता (वर्तमानता, साम्प्रतिकता) अविरुद्ध है । जैसे नष्ट और अनुत्पन्न वस्तुओंके आलेख्याकार वर्तमान ही हैं, उसीप्रकार अतीत और अनागत पर्यायोंके ज्ञेयाकार वर्तमान ही हैं ।
१. ज्ञानमें समस्त द्रव्योंकी तीनोंकालकी पर्यायें एक ही साथ ज्ञात होने पर भी प्रत्येक पर्यायका विशिष्ट स्वरूप -प्रदेश, काल, आकार इत्यादि विशेषतायें – स्पष्ट ज्ञात होता है; संकर – व्यतिकर नहीं होते ।
२. आलेख्य = आलेखन योग्य; चित्रित करने योग्य ।
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शुद्धजीवद्रव्यादिद्रव्यजातीनामिति व्यवहितसंबन्धः । कस्मात् । विसेसदो स्वकीयस्वकीयप्रदेश- कालाकारविशेषैः संकरव्यतिकरपरिहारेणेत्यर्थः । किंच ---यथा छद्मस्थपुरुषस्यातीतानागतपर्याया मनसि चिन्तयतः प्रतिस्फु रन्ति, यथा च चित्रभित्तौ बाहुबलिभरतादिव्यतिक्रान्तरूपाणि श्रेणिकतीर्थकरादि- भाविरूपाणि च वर्तमानानीव प्रत्यक्षेण दृश्यन्ते तथा चित्रभित्तिस्थानीयकेवलज्ञाने भूतभाविनश्च पर्याया युगपत्प्रत्यक्षेण दृश्यन्ते, नास्ति विरोधः । यथायं केवली भगवान् परद्रव्यपर्यायान् परिच्छित्तिमात्रेण
भावार्थ : — केवलज्ञान समस्त द्रव्योंकी तीनों कालकी पर्यायोंको युगपद् जानता है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान नष्ट और अनुत्पन्न पर्यायोंको वर्तमान कालमें कैसे जान सकता है ? उसका समाधान है कि — जगतमें भी देखा जाता है कि अल्पज्ञ जीवका ज्ञान भी नष्ट और अनुत्पन्न वस्तुओंका चिंतवन कर सकता है, अनुमानके द्वारा जान सकता है, तदाकार हो सकता है; तब फि र पूर्ण ज्ञान नष्ट और अनुत्पन्न पर्यायोंको क्यों न जान सकेगा ? ज्ञानशक्ति ही ऐसी है कि वह चित्रपटकी भाँति अतीत और अनागत पर्यायोंको भी जान सकती है और आलेख्यत्वशक्तिकी भाँति, द्रव्योंकी ज्ञेयत्व शक्ति ऐसी है कि उनकी अतीत और अनागत पर्यायें भी ज्ञानमें ज्ञेयरूप होती हैं – ज्ञात होती हैं
द्रव्योंकी अद्भुत ज्ञेयत्वशक्तिके कारण केवलज्ञानमें समस्त द्रव्योंकी तीनोंकालकी पर्यायोंका एक ही समयमें भासित होना अविरुद्ध है ।।३७।।
अब, अविद्यमान पर्यायोंकी (भी) कथंचित् (-किसी प्रकारसे; किसी अपेक्षासे) विद्यमानता बतलाते हैं : —
अन्वयार्थ : — [ये पर्यायाः ] जो पर्यायें [हि ] वास्तवमें [न एव संजाताः ] उत्पन्न नहीं हुई हैं, तथा [ये ] जो पर्यायें [खलु ] वास्तवमें [भूत्वा नष्टाः ] उत्पन्न होकर नष्ट हो गई हैं, [ते ] वे [असद्भूताः पर्यायाः ] अविद्यमान पर्यायें [ज्ञानप्रत्यक्षाः भवन्ति ] ज्ञान प्रत्यक्ष हैं ।।३८।।
ते सौ असद्भूत पर्ययो पण ज्ञानमां प्रत्यक्ष छे .३८.
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ये खलु नाद्यापि संभूतिमनुभवन्ति, ये चात्मलाभमनुभूय विलयमुपगतास्ते किला- सद्भूता अपि परिच्छेदं प्रति नियतत्वात् ज्ञानप्रत्यक्षतामनुभवन्तः शिलास्तम्भोत्कीर्णभूतभावि- देववदप्रकम्पार्पितस्वरूपाः सद्भूता एव भवन्ति ।।३८।।
जदि पच्चक्खमजादं पज्जायं पलयिदं च णाणस्स ।
ण हवदि वा तं णाणं दिव्वं ति हि के परूवेंति ।।३९।। जानाति, न च तन्मयत्वेन, निश्चयेन तु केवलज्ञानादिगुणाधारभूतं स्वकीयसिद्धपर्यायमेव स्वसंवित्त्या- कारेण तन्मयो भूत्वा परिच्छिनत्ति जानाति, तथासन्नभव्यजीवेनापि निजशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धान- ज्ञानानुष्ठानरूपनिश्चयरत्नत्रयपर्याय एव सर्वतात्पर्येण ज्ञातव्य इति तात्पर्यम् ।।३७।। अथातीताना- गतपर्यायाणामसद्भूतसंज्ञा भवतीति प्रतिपादयति ---जे णेव हि संजाया जे खलु णट्ठा भवीय पज्जाया ये नैव संजाता नाद्यापि भवन्ति, भाविन इत्यर्थः । हि स्फु टं ये च खलु नष्टा विनष्टाः पर्यायाः । किं कृत्वा । भूत्वा । ते होंति असब्भूदा पज्जाया ते पूर्वोक्ता भूता भाविनश्च पर्याया अविद्यमानत्वादसद्भूता भण्यन्ते । णाणपच्चक्खा ते चाविद्यमानत्वादसद्भूता अपि वर्तमानज्ञानविषयत्वाद्वयवहारेण भूतार्था भण्यन्ते, तथैव ज्ञानप्रत्यक्षाश्चेति । यथायं भगवान्निश्चयेन परमानन्दैकलक्षणसुखस्वभावं मोक्षपर्यायमेव तन्मयत्वेन परिच्छिनत्ति, परद्रव्यपर्यायं तु व्यवहारेणेति; तथा भावितात्मना पुरुषेण रागादिविकल्पोपाधि- रहितस्वसंवेदनपर्याय एव तात्पर्येण ज्ञातव्यः, बहिर्द्रव्यपर्यायाश्च गौणवृत्त्येति भावार्थः ।।३८।।
टीका : — जो (पर्यायें ) अभी तक उत्पन्न भी नहीं हुई और जो उत्पन्न होकर नष्ट हो गई हैं, वे (पर्यायें ) वास्तवमें अविद्यमान होने पर भी, ज्ञानके प्रति नियत होनेसे (ज्ञानमें निश्चित — स्थिर — लगी हुई होनेसे, ज्ञानमें सीधी ज्ञात होनेसे ) १ज्ञानप्रत्यक्ष वर्तती हुई, पाषाण स्तम्भमें उत्कीर्ण, भूत और भावी देवों (तीर्थंकरदेवों ) की भाँति अपने स्वरूपको अकम्पतया (ज्ञानको) अर्पित करती हुई (वे पर्यायें ) विद्यमान ही हैं ।।३८।।
अब, इन्हीं अविद्यमान पर्यायोंकी ज्ञानप्रत्यक्षताको दृढ़ करते हैं : —
ज्ञाने अजात -विनष्ट पर्यायो तणी प्रत्यक्षता नव होय जो, तो ज्ञानने ए ‘दिव्य’ कौण कहे भला ? ३९.
१. प्रत्यक्ष = अक्षके प्रति — अक्षके सन्मुख — अक्षके निकटमें — अक्षके सम्बन्धमें हो ऐसा ।
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यदि खल्वसंभावितभावं संभावितभावं च पर्यायजातमप्रतिघविजृंभिताखंडित- प्रतापप्रभुशक्तितया प्रसभेनैव नितान्तमाक्रम्याक्रमसमर्पितस्वरूपसर्वस्वमात्मानं प्रति नियतं ज्ञानं न करोति, तदा तस्य कुतस्तनी दिव्यता स्यात् । अतः काष्ठाप्राप्तस्य परिच्छेदस्य सर्व- मेतदुपपन्नम् ।।३९।। अथासद्भूतपर्यायाणां वर्तमानज्ञानप्रत्यक्षत्वं दृढयति — जइ पच्चक्खमजादं पज्जायं पलयिदं च णाणस्स ण हवदि वा यदि प्रत्यक्षो न भवति । स कः । अजातपर्यायो भाविपर्यायः । न केवलं भाविपर्यायः प्रलयितश्च वा । कस्य । ज्ञानस्य । तं णाणं दिव्वं ति हि के परूवेंति तद्ज्ञानं दिव्यमिति के प्ररूपयन्ति, न केऽपीति । तथा हि — यदि वर्तमानपर्यायवदतीतानागतपर्यायं ज्ञानं कर्तृ क्रमकरणव्यवधान- रहितत्वेन साक्षात्प्रत्यक्षं न करोति, तर्हि तत् ज्ञानं दिव्यं न भवति । वस्तुतस्तु ज्ञानमेव न भवतीति । यथायं केवली परकीयद्रव्यपर्यायान् यद्यपि परिच्छित्तिमात्रेण जानाति, तथापि निश्चयनयेन सहजानन्दैकस्वभावे स्वशुद्धात्मनि तन्मयत्वेन परिच्छित्तिं करोति, तथा निर्मलविवेकिजनोऽपि यद्यपि व्यवहारेण परकीयद्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानं करोति, तथापि निश्चयेन निर्विकारस्वसंवेदनपर्याये विषयत्वात्पर्यायेण परिज्ञानं करोतीति सूत्रतात्पर्यम् ।।३९।। अथातीतानागतसूक्ष्मादिपदार्थानिन्द्रियज्ञानं
अन्वयार्थ : — [यदि वा ] यदि [अजातः पर्यायः ] अनुत्पन्न पर्याय [च ] तथा [प्रलयितः ] नष्ट पर्याय [ज्ञानस्य ] ज्ञानके (केवलज्ञानके) [प्रत्यक्षः न भवति ] प्रत्यक्ष न हो तो [तत् ज्ञानं ] उस ज्ञानको [दिव्यं इति हि ] ‘दिव्य’ [के प्ररूपयंति ] कौन प्ररूपेगा ? ।।३९।।
टीका : — जिसने अस्तित्वका अनुभव नहीं किया और जिसने अस्तित्वका अनुभव कर लिया है ऐसी (अनुत्पन्न और नष्ट) पर्यायमात्रको यदि ज्ञान अपनी निर्विघ्न विकसित, अखंडित प्रतापयुक्त प्रभुशक्तिके (-महा सामर्थ्य ) द्वारा बलात् अत्यन्त आक्रमित करे (-प्राप्त करे), तथा वे पर्यायें अपने स्वरूपसर्वस्वको अक्रमसे अर्पित करें (-एक ही साथ ज्ञानमें ज्ञात हों ) इसप्रकार उन्हें अपने प्रति नियत न करे (-अपनेमें निश्चित न करे, प्रत्यक्ष न जाने), तो उस ज्ञानकी दिव्यता क्या है ? इससे (यह कहा गया है कि) पराकाष्ठाको प्राप्त ज्ञानके लिये यह सब योग्य है
भावार्थ : — अनन्त महिमावान केवलज्ञानकी यह दिव्यता है कि वह अनन्त द्रव्योंकी समस्त पर्यायोंको (अतीत और अनागत पर्यायोंको भी) सम्पूर्णतया एक ही समय प्रत्यक्ष जानता है ।।३९।।